गाजीपुर-चाचा-भतीजा की अमर कथा

गाजीपुर-बीते शुक्रवार को समाजवादी पार्टी मुखिया व पुर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव झांसी में थे। वहां, एक सिंचाई परियोजना के बहाने चाचा (शिवपाल यादव) का जिक्र करते हुए बीजेपी सरकार पर जमकर निशाना साधा। अखिलेश यादव ने कहा, ‘हमारे चाचा के कराए काम का वर्तमान सीएम ने पीएम से उद्घाटन करा दिया।’ महज इस जिक्र से शिवपाल के खेमे की उम्मीद एक बार फिर बढ़ गई है।

समाजवादी पार्टी के दरवाजे चाचा के लिए कब खुलेंगे इसकी तारीख अब तक अखिलेश ने नहीं बताई है। लेकिन इतना जरूर कहा है कि चाचा के साथ सम्मानजनक व्यवहार होगा। नजदीकियों का कहना है कि वर्ष 2016-17 की टीस दोनों की एका में रुकावट बन रही है। तारीख पर तारीख और बार-बार अल्टिमेटम पर कोई नतीजा शिवपाल यादव के पक्ष मे सपा में कोई नतीजा आता दिखाई नहीं दे रहा है।चाचा की वापसी या उनकी पार्टी से गठबंधन की कवायद दो साल से भी अधिक समय से चल रही है। कभी गठबंधन के लिए 100 सीटों की मांग करने वाले शिवपाल अब पार्टी के विलय तक को तैयार हैं।

सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव भी सार्वजनिक मंचों से कह चुके हैं कि वह छोर्टी पार्टियों से गठबंधन करेंगे। चाचा के खिलाफ उनकी सीट पर उम्मीदवार नहीं उतारेंगे। लेकिन, बात इससे आगे नहीं बढ़ पा रही है। शिवपाल यादव गठबंधन पर फैसला न होने की सूरत में अलग राह चुनने, दूसरे दलों से गठबंधन की कई बार चेतावनी दे चुके हैं। तारीखें भी दे चुके हैं। मसलन, पहले उन्होंने 11 अक्टूबर तक एसपी को फैसला लेने का अल्टिमेटम दिया था। 23 नवंबर को मुलायम सिंह यादव के जन्मदिन पर सैफई में शिवपाल ने कहा था कि एक सप्ताह में फैसला नहीं होता तो लखनऊ में बड़ी रैली कर अपनी राह चुनेंगे। यह तारीख भी बीत चुकी है, लेकिन न अखिलेश का बुलावा आया है और न ही शिवपाल फैसला कर पाए हैं। 

भागीदारी के पहले अखिलेश देखना चाहते है चाचा का जनाधार- सूत्रों का कहना है कि अखिलेश-शिवपाल की एका की राह आसान नहीं है। 2017 के विधानसभा चुनाव के पहले पार्टी में हुए घमासान में रिश्ते इतने बिखरे और हमलों का सुर इतना सतही रहा कि अब तक उसके घाव भरे नहीं है। दूसरे, अखिलेश यादव चाचा के दावों के बीच उनके जनाधार को भी परख रहे हैं। इसलिए, उन्होंने अब तक न हां किया न तो ना किया है। यह कवायद जितनी लंबी खिंचेगी, शिवपाल के पास विकल्प उतने ही सीमित होते जाएंगे और इस विकल्पहीनता का फायदा चाचा की शर्तों को सीमित करने में मिलेगा।

शिवपाल यादव चाहते हैं कि उनके साथ सपा छोड़कर गए लोगों को भी पार्टी में लिया जाए और टिकट दिया जाए। जबकि, अखिलेश उन लोगों का समायोजन कर पार्टी में ही ‘विपक्ष’ तैयार नहीं करना चाहते। शिवपाल, उनके बेटे आदित्य यादव और एकाध चेहरों को छोड़कर सपा सीटें साझा करने के मूड में नहीं है। वहीं, इतनी सीमित भागीदारी में शिवपाल यादव को अपना सियासी भविष्य खतरे में दिख रहा है। इसलिए, शिवपाल कांग्रेस सहित एकाध और दलों के साथ नाता जोड़ने की संभावनाओं पर भी काम शुरू कर दिया है। 

चाचा ‘बनाम’ चाचा शिवपाल यादव की वापसी और समायोजन की कोशिशों में ‘चाचा’ फैक्टर की भी भूमिका मानी जा रही है। अखिलेश यादव के दूसरे चाचा रामगोपाल यादव और शिवपाल यादव के असहज रिश्ते जग-जाहिर हैं। 2016 में शिवपाल के खेमे में खड़े अमर सिंह ने मुलायम से कहकर रामगोपाल यादव को पार्टी से ही निकलवा दिया था। इसके बाद रामगोपाल ने अखिलेश की ताजपोशी कर अमर सिंह को पार्टी से निकलवाया और शिवपाल को प्रदेश अध्यक्ष के पद से बर्खास्त करा दिया। 2019 के लोकसभा चुनाव में शिवपाल यादव फिरोजाबाद से रामगोपाल के सांसद बेटे अक्षय यादव के खिलाफ चुनाव लड़े। जिसमें चाचा-भतीजा दोनों ही हार गए।

हाल में ही रामगोपाल यादव पर आधारित किताब के विमोचन में शिवपाल यादव को बुलावा तक नहीं गया। बल्कि, किताब में शिवपाल पर अप्रत्यक्ष हमले जरूर हुए। ऐसे में अखिलेश के खेमे में खड़े रामगोपाल भी शिवपाल की वापसी को लेकर होने वाले फैसले को प्रभावित करने की स्थिति में है।वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव के पहले सरकार और पार्टी में वर्चस्व को लेकर हुए घमासान ने सपा की सत्ता मे वापसी के सपने को चकनाचूर कर दिया था। हालांकि, अखिलेश सरकार में तो नहीं लौट पाए लेकिन पार्टी के सुप्रीमो बन गए और शिवपाल हाशिए पर चले गए।

विधानसभा चुनाव के बाद शिवपाल यादव ने प्रगतिशील समाजवादी पार्टी बना ली। उन्होंने इसमें बड़े भाई मुलायम सिंह यादव को भी जोड़ने व उनका समर्थन लेने की कोशिश की। लेकिन, मुलायम शिवपाल के मंच से सपा की तारीफ कर चले आए। 2019 के लोकसभा चुनाव तक शिवपाल और अखिलेश की तल्खी इतनी बढ़ चुकी थी कि शिवपाल ने सपा के खिलाफ उम्मीदवार उतार दिये थे।

सारांश-राजनैतिक विश्लेषकों के अनुसार सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव चाचा की पार्टी का सपा मे विलय कभी नहीं करेंगे। हाँ चाचा के प्रगतिशील समाजवादी पार्टी से गठबंधन अवश्य कर सकते है।अखिलेश चाचा के दल को अधिकतम 5 से 10 सीटे दे सकते है।अलगाव से पहले चाचा के पास जनाधार के नाम पर जो तकत थी वह अखिलेश व उनके दल सपा के पास चली गयी। राजनीति मे कब कौन अर्श पर हो और कब कौन फर्श पर यह तो नहीं कहा जा सकता लेकिन वर्तमान समय मे चाचा काफी हल्के हो चूके है। ( यह लेखक का अपना विचार है)