गाजीपुर-जहां हजरों प्रतिदिन खाना खाते है लेकिन प्रचार नहीं करते

गाजीपुर-फिल्म शेरनी में एक छोटा लेकिन मजबूत चरित्र प्रोफेसर नूरानी का है जो अपने काम को लेकर पैशनेट और प्रतिबद्ध हैं. एक बार उनका प्राचार्य उनसे अखबार दिखाकर कहता है कि शेरनी को पकड़ने वाली टीमों के बारे में निकला है और उसमें तुम्हारा नाम तक नहीं है, तो प्रोफेसर नूरानी कहते हैं कि, मजा तो काम में है, नाम में क्या रखा है? और इसके बाद वह काम पर निकल जाते हैं जंगलों में. यह आज की मानसिकता को दर्शाता है. मैंने कई साहित्यिक गोष्ठियों में शिरकत की है, जहां साहित्यकारों को संवाद से विषय को प्रस्तुत करने और कुछ नए निष्कर्ष निकालने से अधिक जल्दी अखबार में फोटो सहित छपने की होती है. कई साहित्यकारों ने बाकायदे अपने अपने तरीकों से जातियों के नाम पर या अन्य तरीकों से पत्रकारों से सम्बन्ध बनाये हैं ताकि समय समय पर वह अखबारों की कतरनों में दिख सकें. कई स्थानों पर तो गोष्ठी शुरू होने के पहले ही समाचार बन जाते हैं और वह अखबारों तक पहुंचा दिया जाता है. कई स्थानों पर मैंने साहित्यकारों को केवल खड़े होकर हाव-भाव देकर फोटो खिंचवाते हुए देखा, जिससे अखबार पढने वाले को लगे कि वास्तव में यह बोल रहे हैं और सभी लोग सुन रहे हैं.

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शुरू में मुझे थोड़ी जिज्ञासा थी कि अखबारों में खबरें कैसे पहुंचाई जाएँ, लेकिन यह सब देखने के बाद विरक्ति हो गयी. मेरा मानना है कि काम बोलना चाहिए, भले इसमें समय लगे. यदि काम को पैसे देकर पुरस्कृत करवाया जाए या किसी तरह से अखबारों में निकलवाया जाय, तो वास्तव में वह काम बताने लायक नहीं है. मीडिया का युग है लेकिन मीडिया हमारे व्यक्तित्व का हनन न करे और हमें फेक या नकली न बनाए, इसकी आवश्यकता है.

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अपने काम के प्रति पैशनेट और प्रतिबद्ध होने की आवश्यकता है तभी अच्छा काम हो सकता है. बयेपुर देवकली के गंगा आश्रम में मैंने प्रतिदिन भूखों को खाना खाते देखा है, किसी किसी अवसर पर तो ५००० लोग भी खाना खाते हैं, लेकिन गंगा आश्रम ने कभी इसका प्रचार नहीं किया. गांवों में लगने वाली मानव धर्म की शाखाओं में कठिन मुकदमों का निपटारा स्थानीय लोगों की मदद से कर दिया जाता है, लेकिन इसके लिए आश्रम ने कभी अखबारों का प्रयोग नहीं किया. यह अनुकरणीय है.

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अखबारों के पास अपने संवाददाता होते हैं जो शिक्षित हैं. उन्हें पत्रकारिता के कार्य हमसे बेहतर आते हैं. उन्हें समय की आवश्यकता के अनुसार समाचार बनाने और खोजने आता है. उनकी उद्यमिता और कुशलता पर समाचार और प्रचार छोडकर. हमें अपना कार्य करना चाहिए.

माधव कृष्ण के फेसबुक वाल से