गाजीपुर-डा०अम्बेडकर और स्वामी विवेकानंद का दलित चिन्तन

0
160

गाजीपुर-सभी सोशल मीडिया के ‘व्हाट्स एप’ में कुछ लोगों के डाॅ0 अम्बेडकर का वक्तव्य ‘हिन्दू कभी सुधर ही नहीं सकता’ अग्रेसित होकर मेरे पास आया। यह वक्तव्य डाॅ0 अम्बेडकर की धर्म सम्बन्धी समझ पर प्रश्न चिह्न लगाता है। इस वक्तव्य में उनके सामाजिक और राजनैतिक निहितार्थ क्या थे- इन पर फिर कभी चर्चा होगी। किन्तु प्रश्न यही है- क्या हिन्दू वास्तव में कभी सुधर नहीं सकता? यदि यह सत्य है तो महात्मा गौतम बुद्ध को ईश्वर और चार्वाक् को ऋषि की श्रेणी में रखने और मानने वाले कौन थे? साथ ही पश्चिमी समाज और इस्लामिक देशों में देश-काल-परिस्थिति के अनुसार धर्म और धर्मग्रन्थों में अति आवश्यक परिवर्तन अत्यंत जटिल है। यहाँ तक कि महान ऐतिहासिक पुरूषों में शामिल अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने अश्वेतों के सामाजिक और राजनैतिक अधिकार के विषय में कहा था कि, ‘‘मैं न तो इस बात के पक्ष में हूं ना ही कभी था कि नीग्रोज को मतदान का या जूरी में होने का अधिकार दे दिया जाए या कि वे कार्यालय में पदों पर बैठें या फिर श्वेत लोगों के साथ विवाह करें। मैं भी किसी अन्य मनुष्य की भाँति श्वेत जाति के लोगों को उच्चतर पद देने का पक्षधर हूँ।’’ (अब्राहम लिंकन, ‘‘स्पीचेज एण्ड राइटिंग्स 1852-1858; स्पीचेज, लेटर्स, एण्ड मिसेलेनियस राइटिंग्सः 4 लिंकन-डगलस डिबेट्स, वोल्यूम 1’’ पृ0 638)
इस्लामिक सभ्यता और सभ्यता के शिखर पर बैठे पश्चिमी देशों, में ‘हेट क्राइम्स’ आज भी आम बात है। लेकिन बाबा साहेब अम्बेडकर के नेतृत्व और महात्मा गांधी के संरक्षण में दलितों को, बिना किसी गृहयुद्ध या हिंसक क्रान्ति के संवैधानिक संरक्षण मिलने के कारणों पर विचार डालने से, अमत्र्य सेन के शब्दों में, ‘आग्र्यूमेन्टेटिव इण्डियन’ समाज सामने आता है। इस समाज की ‘आग्र्यूमेन्टेटिव परम्परा’ के बीज पुरातन भारत के सत्यार्थ शास्त्रार्थ परम्परा में मिलते हैं। जिसका निकटतम ऐतिहासिक विवरण आदि शंकराचार्य और बौद्ध मण्डन मिश्र तथा उनकी पत्नी भारती के मध्य हुए शास्त्रार्थ में मिलता है। ‘एकं सत् विप्राः बहुधा वदन्ति’ ने भारतीय जनमानस के सहिष्णु तथा विरोधी मत /पन्थ/सम्प्रदाय वालों के साथ सह-अस्तित्व को स्वाभाविक बनाया। समय≤ पर आए विभिन्न विचारकों से शास्त्रार्थ परम्परा समृद्ध होती रही, और भारतीय जनमानस रूढ़ियों को तोड़कर सत्य पकड़ने की औपनिषदिक परम्परा के प्रति जागरूक होता रहा। अद्वैत दर्शन और वेदान्त धर्म को कर्मकाण्डों से हटाकर, सभी के मन में ‘अहं ब्रह्ममास्मि’ का बोध भरता रहा। यद्यपि समय की सड़कों पर स्वार्थ की दूषित हवा से जनमानस के वैचारिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव भी पड़ा लेकिन यदि किसी एक ने इस प्रदूषण को दूर हटाने का दायित्व लिया चाहे वह सती प्रथा हो या विधवा विवाह या स्त्री शिक्षा या दलित अधिकार व स्वाभिमान, समाज ने प्रारम्भिक प्रतिरोध के बाद सत्य का चयन किया। अहिंसक दलित क्रांति के मूल तो औपनिषदिक युग में मिलते हैं जब जीव-मात्र ही ‘सोऽहम्’ का उद्घोष करता है, परन्तु उपनिषदों के विशुद्ध ज्ञानकाण्ड और मानवतावादी दृष्टिकोण का निकटतम विशुद्धतम और ऐतिहासिक व्यक्तित्व स्वामी विवेकानंद में मिलता है। दलित चिंतन इस पक्ष की उपेक्षा नही ंकर सकता कि स्वामी विवेकानन्द उस स्वस्थ भारतीय दर्शन और परम्परा का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसमें जीव-मात्र का भेद भी मिटा दिया गया है।
स्वामी विवेकानन्द के दलित विमर्श पर कुछ कहने से पहले ‘जीम सपमि व िैूंउप टपअमांदंदकं इल ीपे मंेजमतद ंदक ूमेजमतद कपेबपचसमे’ के वाॅल्यूम 1 के पृष्ठ 456 पर वर्णित इस घटना को देखते हैं जो शिकागो विश्वधर्म सम्मेलन के पश्चात घटित हुईः पूर्वी होने के कारण, एक अमेरिकी को उनकी त्वचा अश्वेतों जैसी लगती थी, और दक्षिणी अमेरिका में उन्हें प्रायः नीग्रो समझा जाता था। कभी-कभी उनका अपमान तक किया जाता था लेकिन स्वामी विवेकानन्द इन अपशब्दों के प्रति उदासीनता प्रदर्शित करते थे उसके लिए वर्णभेद क्या जो मानव मात्र में भ्रातत्व का अनुभव करे। एक बार एक नीग्रो कुली ने एक स्टेशन पर स्वागत कमेटी द्वारा उनका स्वागत होता देखकर उनसे हाथ मिलाने की इच्छा व्यक्त करते हुए कहा कि मुझे खुशी है कि हम नीग्रोज में से कोई महान बना है। स्वामी विवेकानन्द ने गर्मजोशी से उसका हाथ अपने हाथों में लेकर बोला, ‘‘धन्यवाद! धन्यवाद भाई!’’ उन्हें, नीग्रो समझे जाने पर कोई आपत्ति नहीं थी। उत्तरी और दक्षिणी शहरों में नाई की दुकानों से उन्हें प्रायः भगा दिया जाता था। अमेरिका के महत्वपूर्ण शहरों में कई बार अश्वेत त्वचा के कारण उन्हें होटल में प्रवेश नहीं दिया जाता था लेकिन इन परिस्थितियों में भी स्वयं को पूर्वी या भारतीय बताना अस्वीकार था। उनकी यात्रा के प्रबन्धकों को अन्य व्यवस्था करनी पड़ती थी। जब कुछ होटेल प्रोप्राइटर्स जिन्होंने उन्हें भगा दिया था, ने उनके व्याख्यानों को किसी सुबह समाचार पत्रों में पढ़ा या किसी अन्य से उनके विषय में सुना तो वे उनसे क्षमा मांगने पहुंच जाते थे। उनके एक पश्चिमी शिष्य ने इन सभी घटनाओं को इंगित कर उनसे आश्चर्य से पूछा कि, ‘‘आप अपनी पूर्वी भारतीय पहचान क्यों नहीं प्रकट करते और बता देते कि आप नीग्रो नहीं हैं?’’ स्वामी जी का उत्तर था, ‘‘क्या! किसी और की कीमत पर अपने को श्रेष्ठतर दिखाना! मैं धरती पर इसलिए नहीं आया!’’ साथ ही स्वामी जी भारतीय होने पर गर्व व्यक्त करते थे।…’’ संसाधनों की कमी से जूझते हुए अपनी पहचान के विषय में एक छोटा सा सत्य कह देने से शारीरिक/मानसिक परेशानियां खत्म हो सकती हो, फिर भी अपने उच्चतर सैद्धान्तिक सत्य को जी लेने का साहस विरले ही कर पाते हैं।
25 मार्च 1896 को हाॅवर्ड विश्वविद्यालय की स्नातक दर्शन परिषद् में अपने भाषण में स्वामी जी कहते हैं, ‘‘सभी वस्तुओं के पीछे उसी देवत्व का अस्तित्व है, और इसी से नैतिकता का आधार प्रस्तुत होता है। दूसरों को कष्ट नहीं देना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को अभिन्न समझकर उसके साथ प्रेम करना चाहिए, क्योंकि समस्य विश्व मौलिक स्तर पर एक है। दूसरे को कष्ट देना अपने को कष्ट देना है। दूसरे के साथ प्रेम करना अपने आपसे प्रेम करना है। इसी से अद्वैत नैतिकता का वह सिद्धान्त उद्भूत होता है, जिसका समाहार एक आत्मोत्सर्ग शब्द में किया गया है। अद्वैतवासियों के अनुसार जीवात्मा ही दुःखों का कारण है। व्यक्ति-सीमित जीवात्मा के कारण मैं अपने को अन्य वस्तुओं से भिन्न समझता हूँ। अतः यही घृणा, ईष्र्या, दुःख, संघर्ष आदि अनिष्टों का कारण है। इसके परिहार से सभी संघर्ष, सभी दूःख समाप्त हो जाते हैं। अतः इसका परिहार आवश्यक है। निम्न से निम्न सत्ताओं के लिये भी हमें अपने जीवन का उत्सर्ग करने को तत्पर रहना चाहिए’’ (विवेकानन्द साहित्य, खण्ड 9, पृ0 69)
स्वामी जी का यह वक्तव्य प्रस्थानत्रयी के अद्वैतमत की आधुनिक व्याख्या है, और यह स्थान-स्थान पर उनके जीवन दर्शन में परिलक्षित हुआ है। व्यक्तित्व और कृतित्व का ऐक्य स्वामी जी के जीवनकाल में प्रत्येक बिन्दु पर प्रदर्शित हुआ। लेकिन स्वामी विवेकानन्द जैसे पुरूषों के जीवन और कृतित्व से धर्म समझने के बजाय पोंगापंथियों और कर्मकाण्डों को धर्म समझ लेना निरी मूर्खता है। मानव स्वभाव उच्चतर आदर्शों को आसान बनाना चाहता है। प्रस्थानत्रय में वर्णित धर्म उपेक्षित रह गए क्योंकि धृति, क्षमा, विवेक, वैराग्य, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह आदि साधनों की अपेक्षा सत्यनारायण भगवान की कथा और गंगा-स्नान सुविधाजनक थे। 17 जनवरी 1894 ई. की मेमफिस में दिया गया व्याख्यान ‘अपील एवं लांश’ नामक पत्र में प्रकाशित हुआ था जिसमें स्वामी जी ने कहा था, (वि0सा0, खण्ड 9, पृ0 133)
‘‘आदि पाप की अपने धर्म की शिक्षा से तुम भ्रम में न पड़ो, क्योंकि वही धर्म आदि पवित्रता की भी शिक्षा देता है। … प्रत्येक आत्मा एक बड़ा हीरा है।… अपने भाई को पापी कहने से बढ़कर निम्नतर बात और नहीं है।… हम अपने को भेड़ न समझें, वरन् सिंह बनें। भेड़ की तरह मिमियाना और घास खाना बन्द कर दें।’’
यह भारतीयता का एक विचित्र तथ्य है कि अपने देशवासियों को दुर्दशा से बाहर निकालने का प्रयास करने की बजाय हम उनके पूर्वजन्म के पापों का तर्क देकर उन्हें इसी दुर्दशा में रहने देते हैं। अतः स्वामी विवेकानन्द जी द्वारा उपनिषदों से निकाले गए इस तथ्य का आधुनिक परिवेश में उद्घाटन एक महान घटना थी। उन्होंने धर्म के सिद्धान्त और व्यवहार के दोगलेपन पर कटाक्ष करते हुए लंदन में ‘वेदान्त और विशेषाधिकार’ नामक भाषण में कहा कि, (खण्ड 9, पृ0 104) ‘‘यदि मैं भारत के किसी अपने पुरोहित से पूछूँ कि क्या वेदान्त में तुम्हें विश्वास है, तो वह जवाब देगा,’’ वह तो मेरा धर्म है, मैं अवश्य विश्वास करता हूँ; वह मेरा प्राण है।’’
‘‘बहुत ठीक, तो क्या तुम प्राणिमात्र की समता और प्रत्येक वस्तु की अनन्य एकता को स्वीकार करते हो?’’
‘‘निश्चय ही मैं स्वीकार करता हूँ।’’
परन्तु दूसरे ही क्षण जब एक नीच जाति का आदमी पूरोहित के पास पहुँचता है, तो उसकी छूत से बचने के लिए वह छलांग मारकर सड़क के किनारे चला जाता है।
‘‘कूदते क्यों हो?’’
‘‘क्योंकि उसके स्पर्शमात्र से मैं अपवित्र हो जाता।’’
‘‘परन्तु तुम तो अभी-अभी कह रहे थे कि हम सब एक ही हैं और तुम स्वीकार करते हो कि प्राणियों में कोई भेद नहींे है।’’
वह जवाब देता है, ‘‘अरे भाई! गृहस्थों के लिए तो केवल यह सिद्धान्त का विषय है। जब मैं संन्यास लेकर वन में जाऊँगा तब मैं समदर्शी हो जाऊँगा।’’ .. अतएव कई हजारों वर्षों का यह कोरा सिद्धान्त ही रहा है और कभी कार्यरूप में परिणत नहीं हुआ। इसे सब समझते हैं, सब इसे सत्य घोषित करते हैं, किन्तु जब व्यवहार में लाने की बात कहो, तो लोग कहने लगते हैं कि इसमें लाखों वर्ष लगेंगे।’’
स्पष्टतः स्वामी विवेकानन्द इस व्यवस्थागत दोष का साक्षात्कार कर चुके थे, अतः उन्होंने अपने गुरू के जीवन में इस एकत्व का प्रमाण देकर स्वयं अपने जीवन में एकत्व समदर्शिता का क्रियान्वयन किया तथा रामकृष्ण मिशन की स्थापना करते समय भेदहीनता की इतनी मजबूत नींव रखी कि आज तक रामकृष्ण मिशन एक महान व्यवस्था बन समाज सेवा में रत है। इसी भाषण में वे कहते हैं कि ‘‘शास्त्र को तोड़ मरोड़कर व्याख्या करने का प्रयास मत करो, उसे यथावत ग्रहण करो। सनातन श्रुतियों ने मनुष्य क्या, जीव-मात्र में उपस्थित उस चैतन्य एकता का सोदाहरण सतर्क वर्णन किया है अतः हम सभी को विभेदीकरण और विशेषाधिकार से रहित समाज के गठन में लग जाना चाहिए। विभेद और विशेषाधिकार की सभी उपस्थितियों को नकार देना चाहिए, जैसे नामों में जातिसूचक शब्द, यथा राम, भारती, सिंह, राय, श्रीवास्तव इत्यादि।
अमेरिका से भारत आने पर मदुरै में अभिनन्दन का उत्तर देते हुए स्वामी विवेकानन्द ने स्पष्ट किया कि, ‘‘हम अपने शास्त्रों में दो प्रकार के सत्य देखते ह,ैं एक मनुष्य के नित्य स्वरूप पर आधारित है, जो परमात्मा, जीवात्मा और प्रकृति के सार्वकालिक संबंध पर विचार करता है। दूसरे प्रकार का सत्य किसी देश, काल या सामाजिक अवस्था विशेष पर टिका हुआ है। पहला मुख्यतः वेदों या श्रुतियों में संग्रहीत है और दूसरा स्मृतियों और पुराणों में। हमें स्मरण रखना चाहिए कि सब समय वेद ही हमारे चरम लक्ष्य और मुख्य प्रमाण रहे हैं। यदि किसी पुराण का कोई हिस्सा वेदों के अनुकूल न हो तो निर्दयतापूर्वक उन्मे अंश का त्याग कर देना चाहिए। और हम यह भी देखते हैं कि सभी स्मृतियों की शिक्षाएं अलग-अलग हैं। एक स्मृति बतलाती है- ‘यही आचार ह,ै इस युग में इसी का अनुशासन मानना चाहिए।’ दूसरी स्मृति इसी युग में एक दूसरे आचार का समर्थन करती है।…. अतः तुम्हारे लिए वही गरिमामण्डित सत्य सबसे बढ़कर है जो सब काल के लिए सत्य है जो मनुष्य की प्रकृति पर प्रतिष्ठित है, जिसका परिवर्तन तब तक न होगा, जब तक मनुष्य का अस्तित्व रहेगा। परन्तु स्मृतियाँ तो प्रायः स्थानीय परिस्थिति और अवस्था भेद के अनुशासन बतलाती है और समयनुसार बदलती जाती हैं। यह तुम्हें सदा स्मरण रखना चाहिए कि किंचित् सामाजिक प्रथा के बदल जाने से हम अपना धर्म नहीं खो देंगे।… हमारे ध्यान देने योग्य विषय केवल यह है कि वेद चिन्तन सत्य होने के कारण सभी युगों में समभाव से विद्यमान रहते हैं किन्तु स्मृतियों की प्रधानता युग परिवर्तन के साथ ही जाती रहती है। समय ज्यों ज्यों व्यतीत होता जायेगा, स्मृतियों का प्रामाण्य लुप्त होता जाएगा और ऋषियों का आविर्भाव होगा।’’
इस वक्तव्य ने आदि शंकराचार्य द्वारा श्रुतियों व स्मृतियों के मध्य विवाद होने पर श्रुतियों को प्रामाणिक माने जाने वाले तथ्य का आधुनिक परिप्रेक्ष्य में पुनरोद्घाटन किया। डाॅ0 अम्बेडकर द्वारा मनुस्मृति को जलाए जाने की प्रतीकात्मक घटना भी इस वक्तव्य में स्पष्ट रूप से सामने आती है कि यह मनुस्मृति हजारों साल पहले तत्कालीन समाज की युगकर्म विभागशः वर्ण व्यवस्था के लिए बनाई गई थी लेकिन इसका उपयोग काल-परिवर्तन होने पर भी सत्ताभोगी उच्च वर्ग अपने लिए करता रहा जिसकी अनुमति न तो वेद देते हैं न ही उनमें वर्णित जीव-मात्र की एकता के मन्त्र। अतः स्मृतियों को दोष देकर भारतीय व्यवस्था को दोष देना नितान्त कट्टरता और अज्ञानता है। शिक्षित लोग अवश्य ही श्रुति में वर्णित एकत्व को स्मृतियों के बासी नियमों पर स्थान देते हैं; परन्तु अनपढ़ और भेड़वत् अनुयायी एकतरफा आलोचना कर राजनैतिक कीचड़ फैलाते रहते हैं।
सितम्बर 1898 को ‘प्रबुद्ध भारत’ पत्रिका के संस्करण में स्वामी विवेकानन्द ने तत्कालीन भारत में ‘हिन्दु’ शब्द के तीन अर्थ गिनाए थे- सनातनी, मुसलमान काल के सुधारवादी सम्प्रदाय और आधुनिक युग के सुधारवादी सम्प्रदाय। यह पूछने पर कि आप किसके साथ हैं, उन्होंने तपाक से कहा- ‘हम सभी के साथ हैं। पर हम अपने आपको ‘मत-छुओ वाद’ में बिल्कुल सम्मिलित नहीं करना चाहते। वह हिन्दूू धर्म नहीं हैः वह हमारे किसी ग्रन्थ में नहीं है; वह एक सनातनी अन्धविश्वास है, जिसने हमारी राष्ट्रीय क्षमता को सदा हानि पहुँचाई है।’
स्वामी विवेकानन्द ने वैचारिक रूप से जहां एक शास्त्रसम्मत और विवेकसम्मत तर्कों और तथ्यों के द्वारा विभेदीकरण के निराकरण का अनथक प्रयास किया वहीं इस समस्या के समाधान का उपाय भी सुझाया तथा अद्वैत सिद्धान्तों के व्यावहारिक क्रियान्वयन पर बल भी दिया। 23 जून 1894 को शिकागो से उन्होंने मैसूर के महाराजा को लिखित पत्र में कहा कि, ‘‘भारतवर्ष के सभी अनर्थों की जड़ है- गरीबों की दुर्दशा। पाश्चात्य देशों के गरीब तो निरे दानव हैं, उनकी तुलना में हमारे यहां के गरीब देवता हैं।… अपने निम्न वर्ग के लोगों के प्रति हमारा एकमात्र कर्तव्य है- उनको शिक्षा देना, उनमें उनकी खोई हुई जातीय विशिष्टता का विकास करना। हमारे जनसाधारण और देशी राजाओं के सम्मुख यही एक बहुत बड़ा काम पड़ा हुआ है। अब तक इस दिशा में कुछ भी काम नहीं हुआ है। पुरोहितों की शक्ति और विदेशी विजेतागण सदियों से उन्हें कुचलते रहे हैं जिसके फलस्वरूप भारत के गरीब बेचारे भूल गए हैं कि वे भी मनुष्य हैं। उनमें तरह-तरह के विचार पैदा करने पड़ेंगे। उनके चारों ओर दुनियां में कहां क्या हो रहा है, इस सम्बन्ध में उनकी आंखें खोल देनी होगी, इसके बाद वे अपना उद्धार अपने आप कर लेंगे। …. गरीबों को शिक्षा देने में मुख्य बाधा यह है- मान लीजिए महाराज, आपने हर एक गांव में एक निःशुल्क पाठशाला खोल दी, तो भी इससे कुछ काम न होगा, क्योंकि भारत में गरीबी ऐसी है कि गरीब लड़के पाठशाला में आने के बजाय खेतों में अपने माता-पिता को मदद देने या किसी दूसरे उपाय से रोटी कमाने जायेगा इसलिए अगर पहाड़ के पास जाना पड़ेगा।‘‘
इसी संवेदना को और विस्तार देते हुए स्वामी जी ने विभाजनकारी तर्कों की भी नकेल कसने का प्रयास किया। मद्रास में लगभग 4000 श्रोताओं के समक्ष व्याख्यान मण्डप में स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि, ‘‘ऐ पिछड़ी जाति के लोगों, मैं तुम्हें बतलाता हूँ कि तुम्हारे बचाव का, तुम्हारी अपनी दशा को उन्नत करने का एकमात्र उपाय संस्कृत पढ़ना है, और यह लड़ना झगड़ना और उच्च वर्णों के विरोध में लेख लिखना व्यर्थ है। इससे कोई उपकार न होगा, इसके लड़ाई झगड़े और बढ़ेंगे, और यह (हिन्दू) जाति, दुर्भाग्यवश पहले ही से जिसके टुकड़े टुकड़े हो चुके हैं और भी टुकड़ों में बँटती रहेगी। जातियों में समता लाने के लिए एकमात्र उपाय उस संस्कार और शिक्षा का अर्जन है जो उच्च वर्णों का बल और गौरव है। एक दूसरा विचार है कि शूद्र लोग निश्चय ही आदिम जाति के या अनार्य हैं। … हमारे पुरातत्वेता भारत के संबंध में स्वप्न देखते हैं कि भारत काली आंखों वाले आदिवासियों से भरा हुआ था और उज्जवल आर्य बाहर से आये- परमात्मा जाने कहाँ से आये… इन सिद्धान्तों की सत्यता के बारे में यही कहना है कि हमारे शास्त्रों में एक भी शब्द नहीं है, जो प्रमाण दे सके कि आर्य भारत के बाहर किसी देश से आये। हाँ, प्राचीन भारत में अफगानिस्तान भी शामिल था, बस इतना ही। और यह सिद्धान्त भी कि शूद्र अनार्य और असंख्य थे, बिल्कुल अतार्किक है। उन दिनों यह संभव नहीं था कि मुठ्ठी भर आर्य यहाँ आकर लाखों अनार्यों पर अधिकार जमाकर बस गये थें। अजी वे अनार्य उन्हें खा जाते, पाँच ही मिनट में उनकी चटनी बना डालते।… सत्ययुग के आरंभ में एक ही जाति ब्राह्मण थी और फिर पेशे के भेद से वह भिन्न-भिन्न जातियों में बंटती गई। बस यही एकमात्र व्याख्या सच और युक्तिपूर्ण है। भविष्य में जो सतयुग आ रहा है उसमें ब्राह्मणेत्तर सभी जातियां फिर ब्राह्मण में परिणत होंगी।‘‘
स्वामी जी के उक्त वचनों में गरीबों तथा निम्न वर्गों के प्रति आत्मीयता का भाव और अशिक्षा-अज्ञान-भेदभाव के कारण झेले जा रहे दुःखों से दुःख का भाव प्रदर्शित होता है। स्वामी विवेकानन्द को स्वयं जातिगत भेदभाव का सामना भारतवर्ष में ही करना पड़ा था जब उनके जन्मना कायस्थ जाति का होने पर तत्कालीन चन्द ब्राह्मणों और पुरोहितों ने प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया था यह कहकर कि कायस्थ शूद्र होते हैं और शूद्रों को संन्यास का अधिकार नहीं। परन्तु स्वामी विवेकानन्द ने धर्म और शास्त्रों के ज्ञानकाण्ड को अपने जीवन में उतारा हुआ था अतः उन्होंने इस आक्षेप को एक साधारण प्रतिक्रिया के साथ झेल लिया।
स्वामी विवेकानन्द ने आगामी 40-50 वर्षों में तथाकथित शुद्र जाति के उन्नयन तथा सत्तारूढ़ होने का स्वप्न भी देखा था। उनके अनुसार निष्काम कर्मयोग का विज्ञान कहता है कि कर्म के लिए कर्म करने वाला मनुष्य ही कल्याण का अधिकारी होता है। हजारों वर्षों से नीच कही जाने वाली ये जातियां सदियों-सदियों से चुपचाप बिना किसी शब्द के कर्म करती आ रही हैं, सताए जाने के बावजूद कोई प्रतिरोध नहीं। यह निष्काम कर्मयोग की पराकाष्ठा है अतः ये जातियां आने वाले समय में भारतवर्ष पर राज्य करेंगी और यह वे स्पष्टतः देख तथा बोल रहे थे। आज उनके वचन अक्षर सत्य हो रहे हैं।
‘धर्म क्या है’ नामक लेख (अवसण् 2 चंहम 300) में वे कहते हैं कि, ‘‘पहले सब संकीर्ण धारणाओं का त्याग करो और हर व्यक्ति में ईश्वर का दर्शन करो। हर व्यक्ति में वे निवास करते हैं… इसे जानना ही धर्म है।’’ इसलिए यह सोचना कि मात्र दलित क्रान्ति मात्र एक महापुरूष की लाई हुई है- पूर्णतः भ्रामक और निराधार है। इस दलित क्रान्ति का पूर्णतः अहिंसक होना, और आज आरक्षण के द्वारा उन्हें वर्षों तक संवैधानिक विशेषाधिकार दिये जाना, इस तथ्य का घोतक है समावेशी भारतीय संस्कृति के श्रुतिसम्मत शास्त्रों और स्वामी विवेकानन्द सरीखे आदर्शों के कारण जनमानस अद्वैतदर्शन के अभेद से पूर्णतः भिज्ञ था। डाॅ. अम्बेडकर का श्रेय इतना ही है कि उन्होंने इसे त्वरण प्रदान किया और यह निश्चित तौर से बहुत बड़ा कार्य था। दलित विमर्शकार तथा विभाजनकारी विचारकों को इन तथ्यों पर ध्यान देना चाहिए तथा अनपढ़ आलोचना को त्याग कर समन्वयकारी सामाजिक व्यवस्था का प्रयास करना चाहिए। इस लेख को स्वामी विवेकानन्द के प्रिय तीन श्लोकों से समाप्त करता हूँ जिनको वे बार-बार उद्धृत करते थे-
शंकराचार्य के निर्वाणषटकम से-
‘‘न मृत्युर्न शंका न मे जाति भेदः चिदानन्दरूपः शिवोऽहंशिवोऽहं अर्थात मेरी मृत्यु नहीं है, शंका भी नहीं, मेरी कोई जाति नहीं है न कोई मत ही क्योंकि मैं सच्चिदानन्द स्वरूप शिव हूँ।’’
और श्रीमद्भगवद्गीता के इन दो श्लोकों से-
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।
विनश्यत्सु अविनश्सन्तं यः पश्यति स पश्यति।।
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरे।
नहिनस्ति आत्मनात्मानं वत्रो यति परांगति।। विनाशवान अर्थात् सम्यक् दृष्टिसम्पन्न व्यक्ति सभी भूतों में बैठे अविनाशी परमेश्वर को ही देखते हुए, कोई हिंसा नहीं करता क्योंकि किसी और से हिंसा, स्वयं के प्रति हिंसा ही होगी। सभी के मूल में परमेश्वर ही है।’’
संस्कृत ज्ञान पर बल देने के पीछे उनका तर्क था कि, ‘‘महान धर्माचार्य रामानुज, चैतन्य और कबीर ने भारत की नीची जातियों को उठाने का जो प्रयत्न किया था, उसमें उन्हें अपने ही जीवनकाल में अद्भुत सफलता मिली थी। किन्तु फिर उसके बाद उस कार्य का जो शोचनीय परिणाम हुआ उसकी कारण मीमांसा होनी चाहिए।… उन्होंने नीची जातियों को उठाया; वे सब चाहते थे कि ये उन्नति के सर्वोच्च शिखर पर आरूढ़ हो जाएँ, परन्तु उन्होंने जनता में संस्कृत का प्रचार करने में अपनी शक्ति नहीं लगाई। यहाँ तक कि भगवान बुद्ध ने भी यह भूल की कि उन्होंने जनता से संस्कृत भाषा का अध्ययन बन्द कर दिया। वे तुरंत फल पाने के इच्छुक थे, इसीलिए उस समय की भाषा पाली में संस्कृत से अनुवाद कर उन्होंने उन विचारों का प्रचार किया। इससे उनके भाव शीघ्र फैले और बहुत दूर-दूर तक फैले। ज्ञान का विस्तार हुआ सही, पर उसके साथ-साथ प्रतिष्ठा नहीं बनी, संस्कार नहीं बना। संस्कृति ही युग के आघातों को सहन कर सकती है, मात्र ज्ञानराशि नहीं।… संस्कार को रक्त में व्याप्त हो जाना चाहिए। … जनता को उसकी बोलचाल की भाषा में शिक्षा दो, उसको भाव दो, वह बहुत कुछ जान जाएगी, परन्तु साथ ही कुछ और भी जरूरी है- उसको संस्कृति को बोध दो। जब तक तुम यह नहीं कर सकते, तब तक उनकी उन्नत दशा कदापि स्थाई नहीं हो सकती। एक ऐसे नवीन वर्ण की सृष्टि होगी, जो संस्कृत भाषा सीखकर शीघ्र ही दूसरे वर्णों के ऊपर उठेगी और पहले की तरह उन पर अपना प्रभुत्व जमाएगी।’’
इस वक्तव्य के प्रकाश में मैं यह सोचना पसन्द करूंगा कि वास्तव में यदि शूद्रों को वेदों, उपनिषदों, गीता तथा वेदान्त सूत्रों और संस्कृत अध्ययन के अधिकार से वंचित न रखा गया होता, तो वे आगे बढ़ते और शंकराचार्य के भाष्यों को पढ़ते हुए स्मृतियों के बल पर समाज में हावी हो रहे कुछ ब्राह्मणों और क्षत्रियों को चुनौती देते और बताते कि वास्तविक सत्य तो कुछ और है। आज भी यदि सम्यक शिक्षा के साथ संस्कृत बोध होता लोग विभाजनकारी दलित साहित्यकारों और राजनेताओं से अवश्य पूछते कि तुम जिस धर्म और धर्मग्रन्थों की निन्दा कर रहे हो उसके प्राणस्वरूप वेद-वेदान्त और गीता में तो जीव-मात्र के अभेदत्व का दर्शन और सत्य रखा गया है, फिर हमें क्यों भड़का रहे हो? डाॅ. अम्बेडकर को भी एक वैकल्पिक दर्शन के लिए बौद्ध दर्शन की ओर जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती क्योंकि उन्हें जिस दर्शन की आवश्यकता थी वह इसी वेदान्त में पड़ा है, और प्रचुर मात्रा में पड़ा है।

माधव कृष्ण
सम्पादक समकालीन सोच
निदेशक, द पीआईएस (उपनिषद मिशन ट्रस्ट), गाजीपुर

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here