गाजीपुर-तथाकथित बांमपंथीयों और दक्षिणपंथियों को आइना दिखाता नौजवान

गाजीपुर-डॉ पी एन सिंह ने कहा कि तुम्हारा संस्कृत साहित्य और दर्शन का उद्धरण, तथा मिथकों की व्याख्या लोगों को चुभ रही है। तुम अपना टोन डाउन कर लो और केवल सेक्युलर विषयों पर लिखो। बहुत शिकायतें आ रही हैं तुम्हारी। मेरे दल के और आस पास के लोग नाराज़ हैं। वाराणसी के एक विद्वान भी तुमसे आहत हैं। तुमने उनके साथ संवाद किया जो उन्हें पसंद नहीं आया। विद्वान साहब ने सबसे संपर्क कर तुम्हे पत्रिका से हटाने को कहा है।

मैंने कहा कि शिकायतों का आना इस बात का संकेत है कि केवल बायीं आंख से दुनियां को देखने और व्याख्यायित करने का प्रयास करने वालों को यह बात चुभ रही है कि दुनिया को समग्र दृष्टि से देखा जाना चाहिए। मेरे लेखों में सेक्युलर मुद्दे उठते हैं लेकिन जब मैं देखता हूँ कि कुछ लोग लाल क्रांति के नाम पर भारत के दर्शन और सांस्कृतिक नायकों को बिना पढ़े ऊल जुलूल लिखते और बोलते हैं तो मुझे प्रश्न करना पड़ता है। अगर वह विद्वान वास्तव में लाल हैं तो उन्हें संवादी होना चाहिए, न कि शिकायती। तो वामपंथ असहिष्णुता और सांस्कृतिक उच्छेदनवादियों का पंथ है जो इस बात की अनुमति नहीं देता कि उनसे अलग लिखा या बोला जाय। अगर चौथीराम यादव यह कविता साझा करते हैं कि परशुराम से पितृसत्तात्मक प्रथा आरम्भ हुई और रामप्रकाश कुशवाहा अपने निबंध में लिखते हैं कि कृष्ण दुर्योधन के ग्वाला कहे जाने से व्यथित थे, इसलिए उन्होंने समत्व योग चलाया। तो ऐसे ‘महान विद्वानों’ से सहमति रखते हुए मौन साधना मेरे वश की बात नहीं।

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मैंने अपनी दृष्टि और अपने विचारों से समझौता न करने की बात करते हुए कहा कि आपके ऊपर विशेषांक निकालकर मेरा दायित्व पूरा हो गया। गाज़ीपुर से नई पत्रिकाओं पूर्वा और गंगा ज्योति का सम्पादन आरम्भ हो रहा है, एक समग्र साहित्यिक और वैचारिक पत्रिका होगी, और दूसरी भारतीय दर्शन की।

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तो जिस असहिष्णु विद्वान और बिना रीढ़ के लेखकों ने डॉ सिंह को अपने दल के साथ दण्ड स्वरूप मुझे पत्रिका से हटवाने का दबाव डाला, उन्हें धन्यवाद भी है क्योंकि वामपंथी खेमे की वैचारिक असहिष्णुता के निचले पायदान से शीर्ष तक का व्यक्तिगत अनुभव हुआ, और इस क्रम में एक अच्छा काम शुरू हो रहा है। समकालीन सोच में धन और ऊर्जा लगाकर अपरिपक्व लोगों की हर बात से सहमति के दबाव में रहने से बेहतर होगा स्वतंत्रचेता आलोचकीय दृष्टि बनाये रखना।( माधव कृष्ण के फेसबुक वाल से)

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लेखक-माधव कृष्ण