गाजीपुर-प्रदेश की भाजपा में क्या चल रहा है ?

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दिल्ली से कभी बीएल संतोष तो कभी दत्रातय होसबोले तो कभी राधा मोहन सिंह लखनऊ में आ धमके! विधायकों, मंत्रियों और संगठन के नेताओं की फीडबैक ली जाने लगी मीडिया में तेजी से खबरें बननी शुरू हुई। केशव मौर्य सबसे पहले बोले लेकिन कुछ अजीब ढंग से- “नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी यूपी में 300 सीटें जीतेगी!” मतलब योगी के नेतृत्व की बात कहने से बचे। उधर सूत्रों के हवाले से टीवी और खबरें आई कि यूपी में योगी के नेतृत्व में ही चुनाव होगा, प्रत्याशियों के चयन में योगी की पसंद का ध्यान रखा जाएगा।

तभी एक और सूत्रों के हवाले से खबरें चली कि दिल्ली और बंगाल चुनाव में मोदी का का चेहरा आगे करने और करारी शिकस्त के बाद उनकी साख गिरी है। इसलिए संघ विचार कर रहा है कि आगामी 5 राज्यों की विधानसभा चुनाव में मोदी को बहुत हाईलाइट नहीं किया जाएगा, रैलियां भी कम होगी। फिर एक खबर आई कि सब योगी को संघ का वरदहस्त है! तो एक खबर और फैली कि करीब ढाई सौ विधायकों का सिग्नेचर ले लिए गए हैं! तभी एक खबर और चली कि प्रदेश प्रभारी राधा मोहन सिंह ने राज्यपाल को कोई बंद लिफाफा थमा आये हैं! एक घण्टे बाद राधा मोहन सिंह का बयान आया कि वे विधानसभा अध्यक्ष हृदयनारायण दीक्षित के यहां साहित्यिक चर्चा के लिए मिलने गए थे।

कई अखबारों में दावे किए गए कि भाजपा यूपी में 100-150 सीटों पर सिमट जाएगी। किसी ने मुझे बताया कि संघ और पार्टी के अंदरूनी सर्वे में भी सरकार के प्रति नाराजगी है! किसी ने बताया कि पंचायत चुनावों में 20-25% सीटों पर ही भाजपा जीत पाई। तो कोई कह रहा कि प्रदेश के आधे ब्राह्मण नाराज चल रहे, पिछड़ी जातियों का तेजी से मोहभंग हो रहा…..मतलब बस खबर ही खबर!

चुनाव को महज 7-8 महीने ही बाकी हैं! पिछली चुनाव के दौरान मैंने अखिलेश यादव सरकार और सपा पार्टी के अंदर खींचतान और झगड़े को लेकर बहुत कुछ लिखा था। मेरी एक वीडियो तो यूट्यूब पर काफी पॉपुलर हो गयी थी, करीब 3 लाख लोगों ने देखे थे … “बापू सेहत के लिए तू तो हानिकारक है!” तब हमारे समाजवादी मित्र काफी नाराज थे मुझसे, और भाजपा वाले साथी तो मानो फूल के लड्डू हो गए थे। सबको नाराज करना अच्छी बात नहीं, और ज्यादा वायरल होता उससे पहले वो वीडियो डिलीट कर दी मैंने। यही सब होता है यहां!

जाहिर है अब कुछ वैसा लिखूंगा तो हमारे भाजपाई मित्र नाराज होंगे, तो हमारे समाजवादी साथी वाह-वाह कहेंगे! बहुत धर्मसंकट है। अमूमन अधिकतर लोग मेरी पोस्ट ओर कमेंट करते हुए भाषा का ध्यान रखते हैं लेकिन उसी में कोई-कोई भूल भी जाते हैं। फिर मेरे सामने ब्लॉक करने के अलावा कोई चारा नहीं होता। अब सड़कछाप भाषा वालों को भला कौन फ्रेंडलिस्ट में रखेगा।

अब तो राजनीति के प्रति लोगों में जागरूकता काफी बढ़ रही है। और नौकरीपेशा, व्यवसायी, किसान, छात्र हर कोई राजनीतिक विचार रखने लगा है। मेरा तो विषय ही राजनीति शास्त्र है। तो भला मैं अछूता कैसे रह जाऊंगा। जिन्हें मेरी पोस्ट अच्छी लगती है उनका बहुत बहुत आभार! और जिन्हें अच्छी नहीं लगती हो तो पोस्ट से दूर रहें। ज्यादा बुरा लगे तो अनफ्रेंड कर दें, उससे भी काम न चले तो ब्लॉक कर दें। अब फेसबुक पर कोई दयादी-भवदी थोड़े है कि कुछ कमेंट लिखना जरूरी ही है और फ्रेंडलिस्ट में किसी के होने से मेरा रोजी-रोजगार चलता है! ( नवीन पान्डेय के फेसबुक वाल से-यह लेखक के अपने विचार है )

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