गाजीपुर-मोहम्मद गौरी को बन्दी बनाने वाला राजपूत

विजयादशमी पर विशेष बल प्रदर्शन करने के लिए सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने आठ गज ऊँचा, आठ रेखाओं से युक्त अष्ट धातु का तीस मन लोह युक्त एक स्तम्भ बनवा कर गड़वा दिया, जिसे चुने हुए वीरों को घोड़े पर सवार होकर लोहे की सांग से उखाड़ना था। पृथ्वीराज स्वयं इस खेल में शामिल हुए पर लोह स्तम्भ को नहीं उखाड़ पाये। उनके कई प्रसिद्ध वीर भी असफल रहे, तब वीरवर धीर पुण्डीर ने पृथ्वीराज से उनका घोड़ा माँगा। धीर पुण्डीर ने पृथ्वीराज के घोड़े पर सवार होकर एक ही झटके में उस स्तम्भ को उखाड़ दिया।

धीर पुण्डीर के इस विरोच्चित कार्य पर सम्राट पृथ्वीराज ने उसे सर्वोच्च शूरमा के विरुद से विभूषित कर सम्मानित किया। इस अवसर पर धीर पुण्डीर ने भी घोषणा की कि वह शहाबुद्दीन गौरी को पकड़ कर सम्राट पृथ्वीराज चौहान के चरणों में पटकेगा। उसकी इस गर्वोक्ति पर जैत्र परमार आदि कई वीर जल भुन गए। जब धीर पुण्डीर आश्विन मास में देवी की आराधना के लिए जालंधर किया तब जैत्र परमार ने इसकी सूचना गौरी को भेजकर उसकी मंशा बता दी। गौरी के चुने हुए सैनिकों ने भगवा वस्त्र धारण कर छल से धीर पुण्डीर को पकड़ लिया और गजनी ले जाकर गौरी के दरबार में प्रस्तुत किया।

गौरी ने जब धीर पुण्डीर को उसे पकड़ने वाली प्रतिज्ञा पर बात की तो धीर पुण्डीर ने आत्म-विश्वास के साथ उसे वीरोचित जबाब दिये। गौरी ने धीर पुण्डीर की वीरता, निडरता और साहस से प्रभावित होकर उसे सम्मानित करते हुए घोड़े, वस्त्र, बख्तर-पाखर-होय और टंकार करता धनुष आदि भेंट देकर कहा कि- “हे हिन्दू वीर ! इन्हें तूं ले जा और जंग के लिए तैयार हो जा, मैं भी अपने वीरों के साथ शस्त्र ग्रहण कर पीछे-पीछे आ रहा हूँ।” इस तरह गौरी ने एक वीर पुरुष को विदा किया और भारत के हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान पर हमले की तैयारी में जुट गया।

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गौरी ने एक बार फिर पृथ्वीराज चौहान पर विजय की कामना करते हुए चढ़ाई की। सूचना मिलने पर हिन्दू सम्राट ने चामुण्ड राय दाहिमा के नेतृत्व में साठ हजार सैनिकों को पानीपत के मैदान में गौरी को दण्डित करने भेजा। धीर पुण्डीर भी अपने 1400 पुण्डीर वीरों के साथ उस समरांगण में शरीक हुए। युद्ध आरम्भ होते ही धीर पुण्डीर शाहबुद्दीन गौरी के सामने जा पहुंचे। गौरी धीर पुण्डीर को देखते ही घोड़े से उतर कर हाथी पर सवार हुआ। धीर पुण्डीर ने अपने वीरों के साथ भयंकर हमला कर गौरी की सेना में खलबली मचा दी। देखते ही देखते धीर पुण्डीर ने गौरी के हाथी पर तलवार से वार कर उसका सुंड-मुंड अलग अलग कर दिया। हाथी के लुढकते ही त्वरित गति से गिरते हुए बादशाह गौरी के सीने पर चढ़ बैठा, तभी जैत्र परमार ने गौरी के छत्र, चिन्ह आदि छीन लिए। इस तरह गौरी धीर पुण्डीर की बांहों में कैद हो गया। उसकी सेना में भगदड़ मच गईगई। यह युद्ध इतना भयंकर था कि हजारों पठानों व अन्य सैनिकों के साथ तीन हजार पुण्डीर वीर रणखेत रहे।

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युद्ध के छठे दिन धीर पुण्डीर ने गौरी को सम्राट पृथ्वीराज चौहान के समक्ष दरबार में पेश कर अपनी प्रतिज्ञा पूरी की। सम्राट ने गौरी पर दस हजार घोड़ों का दण्ड लगाकर उसे रिहा कर दिया। दण्ड में मिले दस हजार घोड़े सम्राट ने धीर पुण्डीर को दे दिए। धीर पुण्डीर को मिले इस सम्मान के बाद जैत्र परमार, चामुण्ड राय आदि कई सामंत खफा हो उठे और उन्होंने धीर पुण्डीर के खिलाफ उसकी अनुपस्थिति में सम्राट के कान भरने शुरू कर दिए।उनकी बातों को मानकर सम्राट ने धीर पुण्डीर के पुत्र पावस पुण्डीर को दिल्ली से निष्कासित कर दिया। पावस पुण्डीर दिल्ली छोड़ लाहौर चला गया और इस घटना की सूचना धीर पुण्डीर के पास भेजी। सूचना पाकर धीर पुण्डीर सिंध की ओर से गौरी के पास पहुंचे। गौरी ने उनका स्वागत किया और अपने हाथ का लिखा पट्टा सौंपा, जिसमें आठ हजार गांव, एक सह्त्र तांबूल लिखा था। धीर पुण्डीर ने गौरी को यह कहते हुए पट्टा वापस कर दिया कि वह सम्राट पृथ्वीराज चौहान का सामंत है अत: किसी और को वह स्वामी स्वीकार नहीं कर सकता। धीर ने केवल रहने के लिए निवास हेतु गौरी की आज्ञा ली और लाहौर से अपने पुत्र पावस को भी वहां बुला लिया।

धीर पुण्डीर वहां एक टीला पर रह ही रहे थे कि कुछ सौदागर घोड़े लेकर आये। उनमें से दो हजार घोड़े धीर पुण्डीर ने ख़रीदे और बाकी सिफारिशी पत्र देकर उसे गौरी को बेचने हेतु भेज दिया। गौरी ने धीर का पत्र पढने के बाद बचे घोड़े खरीद लिए। गौरी के दरबार में खुरासान खां और ततारखां को यह सब ठीक नहीं लगा, उन्होंने गौरी को भड़काया कि धीर ने अच्छे घोड़े खुद रख लिए और बचे हुए आपके पास भेज दिए। सो गौरी ने सौदागर को कीमत नहीं चुकाई। पर जब धीर ने गौरी को पत्र लिखकर कहा कि सौदागर उसके शरणागत है सो उनकी कीमत अदा कर दे। तब गौरी ने मीर मसंदअली के साथ घोड़ों की कीमत धीर पुण्डीर के पास भेज दी जिसे उसने सौदागरों को दे दी।

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उधर खुरासान खां और ततारखां ने षड्यंत्र रचते हुए सौदागरों के मुखिया काल्हन मीर को पत्र भेजा कि- “हमें सूचना मिली है कि धीर पुण्डीर तुम्हें मारकर तुम्हारा धन छिनने वाला है|। ” पत्र पाकर काल्हन मीर ने अपने साथियों के साथ मंत्रणा की कि धीर हमें मारे, इसके पहले हम धीर को मार देते है और यह निर्णय कर वे धीर पुण्डीर के पास पहुंचे और बातचीत करते धोखे से उसे मार डाला।

इस तरह धीर पुण्डीर ने जिन्हें शरण दी उन्होंने ही षड्यंत्र के शिकार होकर अपने शरणदाता की हत्या कर दी। जब यह समाचार दिल्ली पहुंचा तब सम्राट पृथ्वीराज चौहान सहित पूरी दिल्ली शोकमग्न हो गई।

सन्दर्भ : घटना का विवरण ठाकुर सवाई सिंह धमोरा द्वारा लिखित पुस्तक “सम्राट चौहाण पृथ्वीराज” से लिया गया है।