गाजीपुर-ये तब भी बिलबिलाए थे

गाजीपुर-कल सुरेश रैना के खुद को ब्राह्मण बताने पर बिलबिलाए मूर्खों को देखा। ये तब भी बिलबिलाए थे जब रविन्द्र जडेजा ने स्वयं को राजपूत बताया था। ये तब भी बिलबिलाए थे जब मनोज मुन्तजिर ने चंद्रशेखर आजाद के लिए “जियो तिवारी जनेवधारी” लिखा था। ये हमेशा बिलबिला जाते हैं।
जानते हैं सुरेश रैना ब्राह्मण क्यों है? सुरेश रैना ब्राह्मण है क्योंकि जब मध्यकाल में क्रूर विदेशी लुटेरे रोज ही हजारों ब्राह्मणों की हत्या कर उनके जनेव तौलते थे, तब भी उसके पूर्वज डरे नहीं और अपना धर्म नहीं छोड़ा। जब क्रूर मुगलों के राक्षस सैनिक मन्दिरों पर हमला कर के सारे निहत्थे ब्राह्मणों को काट डालते थे, वे तब भी नहीं डरे और अपना धर्म नहीं छोड़ा। जब कश्मीर में पाकिस्तानी आतंकियों ने हिन्दुओं का जीवन नरक बना दिया, वे तब भी नहीं डरे और अपने धर्म पर अडिग रहे। आठ सौ वर्षों के अत्याचार के बाद भी अपने धर्म के साथ खड़े रहने वाले वीरों की सन्तति को यह अधिकार है कि वह छाती ठोक कर अपनी जाति बताये और गर्व से कहे कि हम हम हैं।
मिशनरियों से मिले चन्द सिक्कों के बदले अपना ईमान बेंच चुके वामी धूर्तों ने पिछले कुछ समय से ऐसा मूर्खतापूर्ण मीडियाई माहौल गढ़ दिया है कि वहाँ ब्राह्मण होने का अर्थ कठघरे में खड़ा होना हो गया है। इस देश में न एक बोरा चावल के बदले रिलीजन का धंधा करने वालों को शर्म नहीं आती, न ही मासूम वनवासी बच्चियों को बेचने का धंधा करने वाले लोग शर्मिंदा होते हैं। इस देश में जाति के नाम पर चल रही सैकड़ों प्राइवेट लिमिटेड पार्टियों के लोगों को भी कभी शर्म नहीं आयी, न ही किसी धूर्त ने उनसे जाति का नाम लेने के कारण प्रश्न पूछा। जो लोग कहते हैं कि हमारे सम्प्रदाय में जातियां नहीं होतीं, वे भी रिजर्वेशन का लाभ लेने के लिए अपनी जाति बताते हैं और उन्हें शर्म नहीं आती। और ब्राह्मण से यह उम्मीद कि वह स्वयं को सेक्युलर बना दे? किसे मूर्ख समझते हो बौद्धिक टुच्चों?
कोई व्यक्ति ब्राह्मण हो, राजपूत हो, यादव हो, वैश्य हो या किसी भी जाति का हो, वह यदि अपने धर्मनिष्ठ पूर्वजों की महान परम्परा पर गर्व करना चाहता है, तो वह गर्व कर सकता है। वह गर्व कर सकता है शिवाजी या बाजीराव पर, वह गर्व कर सकता है प्रताप और पृथ्वीराज पर, वह गर्व कर सकता है आल्हा-ऊदल या गोकुल पर… वह गर्व कर सकता है अपने किसान बाप-दादाओं पर…हमारे माथे पर जो तिलक और सर पर जो शिखा है न बाबू, वह हमारे पूर्वजों की हजारों वर्ष की कठिन तपस्या का फल है। चन्द बिके हुए लोगों की धूर्त धारणाएं हमसे हमारा अधिकार नहीं छीन सकतीं।
और शोषण की बी ग्रेड कथाएं ले कर मत उतरना धूर्तों; क्योंकि तुम्हारा वैचारिक बाप भी इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे पाता कि जब आठ सौ वर्ष तक देश में मुश्लिम शासन था तो ब्राह्मण शोषण कैसे कर लेते थे।
और हाँ! सम्भव है कि कल सुरेश रैना तुम्हारी किचकिच से बचने के लिए माफी मांग लें, पर मैं कह रहा हूँ अहम ब्रह्मास्मि। बिगाड़ लो जो बिगाड़ सकते हैं। (इस ब्लॉग का उद्देश्य किसी की भावना को ठेस पंहुचाना नहीं है)

सर्वेश तिवारी श्रीमुख
गोपालगंज, बिहार।