गाजीपुर-योगी आदित्यनाथ,क्या इतिहास अपने आप को दुहरायेगा ?

इतिहास खुद को दुहरा रहा क्या? राजनीतिक शिखर की तरफ बढ़ रहे योगी को भला कौन रोकेगा?

कभी जनसंघ का नेतृत्व कर चुके बलराज मधोक एक बड़ा नाम था। लालकृष्ण आडवाणी अंग्रेजी के अच्छे जानकार थे और इसी कारण से मधोक ने उन्हें जनसंघ में लाया और आडवाणी ने उनकी अंगुली पकड़ जनसंघ के इतने ताकतवर नेता बने कि उन्होंने बलराज मधोक को ही पार्टी से बेदखल कर दिया!

कहा जाता है कि इतिहास खुद को दुहराता है! बताया जाता है कि नरेंद्र मोदी को भी राजनीति का ककहरा सिखाने वाले आडवाणी ही हैं। और कौन नहीं जानता कि ‘राजधर्म’ सिखाने वाले अटल बिहारी वाजपेयी के कोप से गुजराती सीएम नरेंद्र मोदी को बचाने वाले आडवाणी ही थे! आडवाणी अगर मोदी के लिए बैटिंग न करते तो क्या पता मोदी आज कहाँ होते! लेकिन आडवाणी का क्या हश्र हुआ? उन्हें पार्टी से बेदखल तो नहीं किया लेकिन राजनीति से बेदखली तो हो ही गयी! हमेशा के लिए पीएम इन वेटिंग बने रहने का टीस आडवाणी को जरूर होगा और जब राष्ट्रपति पद का चुनाव होने को था तो मेरे जैसे बहुतों को आशा थी कि मोदी अपने गुरु को गुरुदक्षिणा जरूर देंगे। आडवाणी को राष्ट्रपति भवन तो नसीब नहीं हुआ लेकिन मार्गदर्शक मंडल में जगह जरूर मिली! अब मैं यह नहीं जानता कि मार्गदर्शक मंडल की बैठक कभी हुई या नहीं? या मार्गदर्शक मंडल की राजनीति और सरकार में कोई भूमिका भी है या नहीं? मतलब बलराज मधोक को आडवाणी और मोदी ने आडवाणी की राजनीतिक सफर का टिकट जब्त किया, ऐसा कहूँ तो शायद कोई मेरी बात से असहमत ना हो!

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इतिहास खुद को दुहरा रहा है! अभी राजनीतिक आकाशगंगा में एक नया ध्रुव तारा टिमटिमा रहा है- नाम है योगी। यूं तो उन्हें सब कुछ विरासत में मिली है लेकिन उन्होंने खुद को साबित भी किया है। मुझे उनकी कोई आध्यात्मिक उपलब्धि के बारे में जानकारी नहीं जिनके बदौलत उन्हें गोरखनाथ मठ का महंत चुना गया! लेकिन यह जरूर कहूंगा कि उन्होंने गोरखनाथ मठ के महंत के रूप में खुद को साबित किया। महंत अवैद्यनाथ के बाद गोरखपुर की सांसदी भी विरासत में मिली लेकिन उन्होंने फिर खुद को साबित किया और गोरखपुर में उनकी लोकप्रियता किसी से छुपी नहीं है।

यूपी 2017 का चुनाव मोदी और केशय प्रसाद मौर्य के नेतृत्व में लड़ा गया! तब कुछ लोग ऐसा अनुमान लगाते थे कि शायद चुनाव बाद केशव ही यूपी के मुख्यमंत्री होंगे! पिछड़े वर्ग का बहुत बड़ा समर्थन भी मिला और 403 में 325 सीटें अकेले बीजेपी और उसके सहयोगियों ने जीत ली।

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गोरखपुर और उसके आसपास के दो-चार जिलों में थोड़ा बहुत प्रभाव रखने वाले योगी को उनकी किस राजनीतिक उपलब्धि की बदौलत 2017 में उन्हें उत्तर प्रदेश जैसे एक बड़े राज्य का मुख्यमंत्री बनाया गया, मुझे नहीं पता। लोग कहते हैं कि भाजपा चुनाव जीती और मोदी-शाह ने यूपी की सत्ता प्लेट में सजाकर योगी को सौंप दी। लेकिन मैं कहूंगा कि योगी ने फिर खुद को साबित किया। आज वे न सिर्फ यूपी भाजपा का पर्याय बन चुके हैं बल्कि वे हिंदुत्व के सबसे बड़े ब्रांड भी हैं! चुनावों में हैदराबाद से लेकर गुजरात, केरल, बंगाल, असम तक उनकी डिमांड है। उन्होंने खुद को एक मझे हुए राजनेता की तरह स्थापित किया है। उनकी आभामंडल से बड़े-बड़े राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखने वाले लोग पस्त हैं। देश की शाही जोड़ी बन चुके मोदी-शाह को भी यूपी की 80 सीटों के लिए अब योगी पर निर्भरता है और योगी ने 2019 में सपा-बसपा गठबंधन के बावजूद 62 सीटें जीतकर मोदी की झोली में दिया। ये मामूली बात नहीं।

देश में केवल दो राज्य हैं जहाँ प्रदेश भाजपा के ‘पोस्टर’ पर मोदी की तस्वीर नहीं दिखती- कर्नाटक और उत्तर प्रदेश! और शाही जोड़ी को न तो येदुरप्पा का कोई विकल्प सूझ रहा और न योगी का! येदुरप्पा का कर्नाटक से बाहर कोई भविष्य नहीं लेकिन अभी योगी की राजनीति पारी कितनी लम्बी चलेगी, भला कौन भविष्यवाणी कर सकता है!

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मैं भी मानता हूं कि राजनीति बहुत निष्ठुर और छलिया होती है। समय के साथ कई उदाहरण बनते रहते हैं और भावी पीढियां उन उदाहरणों की जिक्र जरूर करती है जैसे मैंने बलराज मधोक और आडवाणी का जिक्र किया! कल मोदी-योगी ही नहीं, अनंत राजनीतिक गाथाओं की जिक्र होगी!मै फूलचन्द सिंह इस आर्टिकल के लेखक नवीन पान्डेय जी के विचार से सहमत नहीं हुँ,कारण यह है कि जितने नाम पान्डेय जी ने गिनाए है उनमें और योगी आदित्यनाथ मे जो सबसे बडा अन्तर है वह यह है कि योगी के पास अपना एक खुद का कई दशक पुराना संगठन है।यदि योगी के साथ कोई छेड़छाड़ हुई तो उत्तर प्रदेश में शिवसेना के तर्ज पर एक नया हिन्दुत्ववादी राजनैतिक संगठन का उदय होगा जो सत्ता में आये या न आये लेकिन भाजपा की प्रदेश मे लुटिया अवश्य डूबा देगा। ( यह लेखकों के अपने विचार है)

नवीन पाण्डेय
प्रवक्ता, राजनीति शास्त्र