गाजीपुर-लैंगिक समानता कानून पर सामाजिक संस्कार भारी

गाजीपुर-बाल विवाह निषेध (संशोधन) विधेयक के लागू होने पर लड़कियों की शादी की उम्र सीमा इक्कीस हो जाएगी। अभी तक जिन अठारह से बीस उम्र की लड़कियों की शादी तय हो चुकी है या वर तलाश की जा रही है। उनके मातापिता बेटियों को जल्दी से विवाह बंधन में बांध देना चाहते है। कई मुसलमान निकाह में इसे कानूनी बाधाएं मान रहे हैं। इसी के चलते मुस्लिम समाज में भी निकाह की प्रक्रिया तेजी से चल रही है। इस कानून के लागू होने से पहले मुस्लिम मातापिता अपने बेटियों की निकाह कर लेना चाहते हैं। इस समय होने वाले निकाहनामे में दुलहनों की उम्र 18 से 20 साल वालों की संख्या अधिक है। ऐसे लड़कियों की अधिकांश शादियां और निकाह आने वाले महीनों के लग्न मुहूर्तों में तय तारीख पर होना निश्चित किया गया है लेकिन बिल पास होने के डर ने ऐसे परिवारों में हड़बड़ी मची है और वह तय तारीख से पहले ही शादी करने की कोशिश में हैं। कई जिम्मेदार कामकाजी माताएं अपने बेटियों की शादी उम्र के अंतराल को देखकर तो कई नौकरीशुदा लोग अपने सेवा निवृति से पूर्व शादी नियोजित आयोजित कर इस कानून को आने से पूर्व विवाह संपन्न करने की जुगत बना रहे है। मुस्लिम समाज में कई मातापिता अपने बेटियों की शादी उम्र, व्यवस्था और पारिवारिक जिम्मेदारियों, आर्थिक समस्याओं की वजह से जल्दी कर देना चाहते है उन्हें इस कानून के लागू होने से पूर्व ही बेटियों की निकाह कर देने की चिंता है। समाजशास्त्री लोग कहते है कि लैंगिक समानता कायम रखने के लिए सरकार ने युवतियों के शादी की उम्र युवकों के समान करने का फैसला बिल्कुल सही लिया है लेकिन सामाजिक स्तर पर लोग पत्नी की उम्र से अधिक उम्र के पति की कामना रखते है। पति की श्रेष्ठता कायम रखने के लिए उसे पत्नी की आयु से बड़ा रखने का प्रचलन है। जिससे लोग इक्कीस वर्ष की कन्या के लिए बाइस से पचीस वर्ष के वर का युगल को प्राथमिकता देना शुरू कर देंगे।