गाजीपुर-विकास की दौड़ में पीछे छूट गई कजरी व झूला


गाजीपुर-हमारे सामाजिक परिवेश में अलग-अलग मौसम और उत्सव में तमाम लोकगीत गाए जाते है। सावन में कजरी गायन उसमें से एक है जिसे महिलाएं अपने सास ननद या परिवार की बुजुर्ग महिलाओं से सीखती हैं। सावन का जिक्र आते ही कजरी की याद बरबस आ जाती है लेकिन आज आधुनिकता की चकाचौंध में यह विधा कमजोर पड़ रही है। ग्रामीण अंचल में पूर्वांचल के साथ ही कजरी पूरे देश में पसंद की जाती है। धान की रोपनी, सोहनी, मेहंदी रचने, झूला झूलने और श्रावणी व्रत पूजन में महिलाएं इसको गाती है। कजरी में अध्यात्म, संयोग-वियोग, हास-परिहास, प्रेम-प्रसंग आदि समाहित रहता है। बड़ा दरद होला नरमी कलाई में, भांग के पिसाई में ना। …राधा झूल रही मधुबन में ना और पिया मेंहदी मंगा द मोतीझील से, जायके सायकिल से ना…इसमें अध्यात्म, पति प्रेम एवं नशा उन्मूलन के सन्दर्भ छिपे हुये है। शिवपार्वती, राधाकृष्ण के प्रणय रस में पींगे नोंक झोंक एवं हंसी ठिठोली गीत सावन की रिमझिम फुहार के बीच झूला डालकर हंसी ठिठोली करते हुए सरस और माधुर्य कजरी गायन करती युवतियां महिलाएं अब घरों में मोबाइल टीवी पर व्यस्त है। सावन का महीना तमाम तीज त्यौहारों से भरपूर होता है। सावन के तीज एवं अन्य पर्व स्वस्थ मनोरंजन के साधन तथा मेल मिलाप के माध्यम होते है। श्रद्धा उमंग और खुमारी के संगम से शुरू होने वाले इस महीने का चरम हरियाली तीज और भाई बहनों के प्रेम त्याग समर्पण के रक्षाबंधन पर समाप्त होता है। भारतीय परंपरा में सावन आने का मतलब है सुहागनों के सजने संवरने के दिन, हाथों में हरी चूड़ियां और मेंहदी रचे हाथों से झूला झूलते हुए कजरी जैसे लोकगीतों से पूरे माहौल को खुशनुमा और रूमानी बना देना। सावन के इस महीने में नागपंचमी को सपेरों की बीन तो कहीं भाई का इंतज़ार करते राखी लिए बहनों को देखते ही बनता है। मिट्टी के अखाड़ों में दांवपेंच लड़ाते पहलवानों से मानो दुनिया की तमाम परंपराओं और त्यौहारों का सतरंगी रूप इस एक महीने में सिमट गया हो।