गाजीपुर-विदेशी यादव के पुत्र और पौत्र की पीएम व राष्ट्रपति बनने की कहानी

रसड़ा के गिरमिटिया विदेशी यादव ने अपनी दूसरी और तीसरी पीढ़ी को मारीशस का राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री बना दिया..

  • अनिरुद्ध जगन्नाथ और प्रविंद जगन्नाथ, के पूर्वज 1873 में गिरमिटिया मजदुर बनकर मारीशस गये थे.
    -91 बरस के अनिरुद्ध जगन्नाथ का 03 जून 2021 की रात मे निधन हो गया

{पूरब की जवानी- पूरब का पानी- पूरब की कहानी:-भाग-1}

@ अरविंद सिंह

जब ब्रितानिया हुकूमत ने भारतीय उपमहाद्वीप में अपने पांव तेजी से पसारना शुरू किया तो उत्तर भारत भी उससे अछूता नहीं रहा. गुलामी की बेड़ियों में जकड़े एक महादेश की मन:स्थिति क्या हो सकती है,यह उस भारत से बेहतर कौन जान सकता है. उसने तो इसे पल-पल भोगा और झेला है. ऐसी त्रासदियों की अनकही और अंतहीन कहानियाँ, इस महादेश के गांव-गांव और घर-घर की हकीकत बयानी हैं. यह आपबीती भर नहीं है, बल्कि यह भय, भूख, विवशता, विरह-वेदना, टीस, त्याग और औपनिवेशिक अपमान की अभिशप्त कहानियाँ हैं. जिसमें माटी से मोह और उससे जबरन पलायन का, जीवन भर का ही नहीं, बल्कि पीढ़ियों का आर्तनाद है, जो भारतीयों के रोम-रोम से दर्द बनकर टपकता रहा है. ऐसी गहन दारूण परिस्थितियों की उपज है ‘गिरमिटिया’.
भारतीय उपमहाद्वीप के लिए यह केवल शब्द भर ही नहीं है, बल्कि वेदना और अंतहीन पीड़ा का रिसता हुआ ऐसा मनोविज्ञान था और है, जिसे इस औपनिवेशिक देश की आबादी ने पीड़ा और अंतहीन दंश के रूप में दिनों-रात, पीढ़ियों से पीढ़ियों तक भोगा है. जहाँ गाँव में हर उस घर में सुबह शाम और भोरहरी में अपनों के गिरमिटिया बन परदेस भेज दिए जाने पर, विरह का मेला लगता था,और बूढ़े माँ बाप की विलाप करती रूदावलियां सुनाई पड़ती थीं..
पूरब का देस, यानि उत्तर प्रदेश का पूर्वांचल और बिहार राज्य की भोजपुरी आबादी की पट्टी भी इस शब्द को पीड़ा का पर्याय ही मानती है. गांव-गांव से बिदेसिया और गिरमिटिया बनाने की परंपरा के मूल में आर्थिक विपन्नता और औपनिवेशिक विवशता रही. पूर्वांचल में अंग्रेजी हुकूमत ने गोरखपुर में लेबर डीपो खोला और यहीं से पूरबियों का एग्रीमेंट कर उन्हें अपने दूसरे औपनिवेशिक भू-भागों( मारीशस, फिजी, गुयाना, ट्रिनाड, सूरीनाम आदि) पर भेजना शुरू किया. मजदूरों का एग्रीमेंट करने की प्रक्रिया को देसज भाषा में ‘एग्रीमेंटिया’ कहा जाने लगा और कालांतर में यह शब्द ‘गिरमिटिया’ हो गया.
एक रिकॉर्ड के अनुसार 2 नवंबर, 1834 को भारतीय मजदूरों का पहला जत्था गन्ने की खेती के लिए कलकत्ता बंदरगाह से ‘एमवी एटलस’ जहाज पर सवार होकर मारीशस पहुंचा था। पानी की जहाजों से महिनों की यात्रा में ये भारतीय मजदूर परदेस अपने साथ कुछ लेकर नहीं गये, बल्कि श्रुति परंपरा में रामायण की चौपाइयां और गीता का ज्ञान अपने मानस में लेकर गयें. और जिन पठारों-पहाड़ों और वनों के देश में उन्हें अंग्रेजी जहाज ने टापुओं पर उतारा, पूरबियों ने उन पहाड़ों, पठारों और घने जंगलों को भी काट आबादी बसा लिया. सच कहें तो परदेस में भी एक मिनी हिन्दुस्तान बसा दिया.
गिरमिटिया की इन त्रासद भरी कहानियों में एक कहानी पूर्वांचल के बिदेशी यादव और झुलई यादव की भी है. मूलरूप से बलिया के रसड़ा के एक गाँव अठिलपुरा से इन दोनों भाईयों को ब्रितानिया हुकूमत के सिपाहियों ने गोरखपुर में गिरमिट कर( एग्रीमेंट कर) कलकत्ता के पानी की जहाज़ से 1873 में मारीशस गन्ने की खेती के लिए भेज दिया . वहां पहुँच कर उन्होंने अपने अदम्य श्रमशक्ति से खेतों में गन्ना उपजाया, पत्थरों को तोड़ा और आबादी बसाया, धीरे-धीरे भारतीय मजदूरों ने भारत के बाहर मारीशस में भी एक भारत बसा लिया है और वहाँ के सामाजिक और राजनीतिक जीवन में व्यापक हस्तक्षेप कर सत्ता तक पहुँच बना लिया.
बिदेशी यादव के पुत्र अनिरुद्ध जगन्नाथ, मारीशस के सर्वोच्च सत्ता प्रतिष्ठान तक पहुँचे. वे वहाँ के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति तक बनें. यहीं नहीं उनकी तीसरी पीढ़ी में अनिरुद्ध जगन्नाथ के पुत्र यानि विदेशी यादव के पौत्र प्रविंद जगन्नाथ आज दूसरी बार मारीशस के प्रधानमंत्री बनकर सेवा कर रहे हैं.. भारत में जब पहले अप्रवासी दिवस सम्मान देने की बात आयी तो भारत मित्र अनिरुद्ध जगन्नाथ का नाम सबसे पहले आया. और उन्हें पहला अप्रवासी सम्मान दिया गया. कल अनिरुद्ध जगन्नाथ 91 बरस की अवस्था में इस दुनिया को छोड़कर चले गयें. भारत अपने इस हिंदी प्रेमी के अलविदा से दुखी है और पूर्वांचल के बलिया का अठिलपुरा गांव, अपने भारतवंशी पूर्वज के इस निधन से गहरे दुख में डूबा हुआ है.
यह पूरबियों की जीवटता और अदम्य श्रमशक्ति की साहस है कि वे पत्थर को पिघलाकर मोम बना सकने की क्षमता रखते हैं. पूरब का पानी और पूरब की जवानी की यह संघर्ष भरी कहानी, दुनिया की महान संघर्ष भरी कहानियों में से एक है.
आज भी मारीशस में हर साल दो नवंबर को ‘आप्रवासी दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। जिस स्थान पर भारतीयों( मजदूरों) का पहला यह जत्था उतरा था, वहां आज भी आप्रवासी घाट की वह सीढ़ियां स्मृति स्थल के तौर पर मौजूद हैं..

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क्रमशः..
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