गाजीपुर-साहित्यकारों का हुआ सम्मान

गाजीपुर-नगर के लंका मैदान स्थित सभागार में हिन्दी के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ मान्धाता राय के ७५वें जन्मदिवस पर अमृत महोत्सव और वरिष्ठ साहित्यकार सम्मान समारोह का आयोजन किया गया. समारोह के अध्यक्ष वरिष्ठ साहित्यकार डॉ जीतेंद्र नाथ पाठक ने अध्यक्षीय उद्बोधन में अपने शिष्य डॉ मान्धाता राय को साहित्य से जीवन-स्रोत पाने वाला मनीषी बताया तथा उन्हें सतत लिखने पढ़ते रहने का आशीर्वाद दिया. समारोह का आरम्भ सरस्वती माता की प्रतिमा पर अतिथियों द्वारा माल्यार्पण, दीप प्रज्ज्वलन और आर्या दीक्षित की संगीतमय प्रार्थना से हुआ. इस अवसर पर पी जी कॉलेज के हिन्दी विभागाध्यक्ष द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘रचनाशील मान्धाता राय’ का लोकार्पण भी सम्पन्न हुआ. मंचस्थ अतिथियों ने डॉ मान्धाता राय को अंगवस्त्रम, स्मृति चिह्न देकर उनको आशीर्वाद दिया और उन्हें शतायु तक साहित्य सृजन करते रहने के लिए प्रेरित किया.
डॉ मान्धाता राय ने जनपद के १६ वरिष्ठ हिन्दी साहित्यकारों को अंगवस्त्रम, स्मृतिचिह्न देकर साहित्य की विभिन्न विधाओं में योगदान के लिए सम्मानित किया – डॉ जीतेंद्र नाथ पाठक, प्रो सर्वजीत राय, डॉ पी एन सिंह, अनंत देव पाण्डेय, डॉ जनार्दन राय, रामवतार, शेख जैनुल आबदीन, हरी नारायण हरीश, विनय राय बबुरंग, डॉ कैलाश नाथ पाण्डेय, प्रो रामबदन राय, डॉ गजाधर शर्मा गंगेश, डॉ कमलेश राय, लक्ष्मण केडिया, रवि अग्रवाल.
समारोह के मुख्य अतिथि प्रो सर्वजीत राय ने कहा कि डॉ मान्धाता राय का शोध परक लेखन अत्यंत उपयोगी है. राही मासूम रजा की कृति आधा गाँव पर शोधार्थियों को शोध करने में बहुत कठिनाई होती थी. मान्धाता राय ने आधा गाँव की विद्वत्तापूर्ण समीक्षा लिखी जो इतनी लोकप्रिय हुई कि हाथों हाथ ली गई, और इस पुस्तक पर शोध के द्वार खुल गये. आज उन्होंने अपने जन्मदिन पर साहित्यकारों का सम्मान कर एक नयी परम्परा का आरम्भ किया.
पुस्तक ‘रचनाशील मान्धाता राय’ के सम्पादक मण्डल में सम्मिलित लेखक माधव कृष्ण ने पुस्तक पर केन्द्रित वक्तव्य देते हुए कहा कि इस पुस्तक में लालकृष्ण आडवाणी का मान्धाता राय जी को अपनी पार्टी के लिए सुझाव देने पर एक धन्यवाद पत्र है, जो यह बताता है कि एक साहित्यकार बुद्धिधर्मा बिना किसी पार्टी का सदस्य बने ही राजनैतिक और सामाजिक हस्तक्षेप कर सकता है. मान्धाता राय जी मूकदर्शक साहित्यकार नहीं. वह हिंदी साहित्य के अनुसंधानकर्त्ता साहित्यकार हैं.
विशिष्ट अतिथि बलिया से पधारे डी लिट् डॉ जनार्दन राय जी ने कहा कि डॉ मान्धाता राय के कारण ही उनका डी लिट् हुआ इसलिए वह उनके गुरु हैं. पढना ऋण है लिखना ऋण की अदायगी. व्यक्ति का अभिव्यक्त हो जाना और अभिव्यक्ति को दूसरों तक पहुंचा देना मेरे गुरुदेव डॉ मान्धाता राय की उपलब्धि है.
भाषा वैज्ञानिक डॉ कैलाशनाथ पाण्डेय जी ने कहा कि डॉ मान्धाता राय ने गाजीपुर के शांत साहित्यिक वातावरण में इस कार्यक्रम से एक हलचल पैदा की है बिल्कुल उसी तरह जैसे अपने प्राचार्य काल में उन्होंने स्वामी सहजानंद पी जी कॉलेज के अकादमिक वातावरण को जीवंत रखा. प्रो रामबदन राय जी ने कहा कि मान्धाता भैया के लिखने और बोलने में विनम्रता और साहस दोनों है. उनकी कहानी ‘बीच का खम्भा’ बहुत पहले बिहार के एक समाचार पत्र में छपी थी और उसे बेहद पसंद किया गया था. इस प्रकार उन्होंने समीक्षा के अतिरिक्त साहित्य की अन्य विधाओं में भी अपने हाथ आजमाए हैं. डॉ व्यासमुनी राय ने उन्हें भारतीय संस्कृति और अध्यात्म को जीवन चरित्र में उतार लेने वाला बताया जिसकी पाश्चात्य संस्कृति के पीछे भाग रहे आधुनिक समाज को बहुत आवश्यकता है इस प्रकार वह रोल मॉडल हैं. कुंवर सिंह पी जी कॉलेज से पधारे एसो प्रो डॉ अजय कुमार पाठक ने अपने को प्राचार्य डॉ मान्धाता राय का आदमी बताया और कहा कि मेरी ही तरह महाविद्यालय के एनी प्राध्यापकों के व्यक्तित्व की निर्मिति में प्राचार्य जी का योगदान है. रामावतार जी ने कहा कि मान्धाता राय मूलतः समीक्षक हैं. शेख जैनुल आबदीन ने कहा कि उन्हें वंश से पॉजिटिव चरित्र मिला है. श्री हरी नारायण हरीश ने उन्हें ऐसा विरल साहित्यकार बताया जिसने न कभी दरबार लगाया और न ही किसी दरबार में उपस्थिति दर्ज की. शेषनाथ राय जी ने कहा ‘जिया मान्धाता लाख बरिस.’डॉ अवधेश नारायण राय ने उन्हें उत्तम स्वास्थ्य की शुभकामना दी. डॉ श्रीकांत पाण्डेय जी ने उन्हें लोकप्रिय अनुशासनप्रिय प्रशासक बताया जिनके नेतृत्व के उनका महाविद्यालय ऊर्ध्वगामी बना रहा. उनके छात्र डॉ पंकज कुमार सिंह जी ने कहा कि मेरे प्राचार्य जी महाविद्यालय के चौकीदार थे, उन पर कोइ उंगली उठा ही नहीं सकता, वे हमेशा छात्रों का प्रोत्साहन करते थे. उनके सहपाठी नथुनी तिवारी ने कहा कि सीधी लकीर खींचना कठिन होता है पर मेरे मित्र ने साहित्य और प्रशासन में सीधी लकीर खींची व सीधी बात की. रंगकर्मी सुनील कुमार यादव ने ऐसे मनीषी के पुत्रों एडवोकेट राजीव राय और डॉ हिमांशु राय के संस्कारों पर गर्व करते हुए कहा कि ऐसे मनीषी के घर के आंगन में जन्म लेना ही सौभाग्य की बात है.
समारोह के समापन सत्र में काव्य पाठ हुआ. लोकप्रिय गीतकार डॉ कमलेश राय ने यह गीत सुनाकर वाहवाही लूटी, “ढाई आखर पढ़ प्रेम क सिरजा प्रेम कहानी. सबके गरे लगावा सबसे बोला मधुरी बानी. बहे अइसन बयार कहीं होखे नाहीं रार कि अंजोरिया बढे न.” गजाधर शर्मा गंगेश जी ने कविता सुनायी, “जन्मदिन यह खुशी लेके आता रहे/मुस्कुराकर गले से लगाता रहे/हम सभी की उमर भी लगे आपको/दाहिने देवी सम्मुख विधाता रहे/” श्री सुरेन्द्र नाथ राय ने ओजपूर्ण कवितायें पढीं और सोहर गाया.
अंत में डॉ मान्धाता राय ने आभार ज्ञापन किया और आयोजन समिति के सदस्यों डॉ विनय कुमार दूबे, प्रो अवधेश नारायण राय, डॉ सतीश कुमार राय, इंजीनियर माधव कृष्ण, डॉ अजय कुमार राय को अंगवस्त्रम देकर सम्मानित किया. सभी सत्रों का संचालन डॉ अजय कुमार राय ने किया.डॉ विनय कुमार दूबे ने अतिथियों का स्वागत किया.

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