मऊ-अभी जिन्दा है मेरी मां मुझे कुछ भी नहीं होगा

अभी जिन्दा है मां मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा?
मैं घर से जब निकलता हूं दुआ भी साथ चलती है?—?
रबिवार को जब हमने फेसबुक खोला मातृदिवस का शोर सुनकर बड़ी हैरत हुई? देर तक सोचता रहा क्या वास्तव में फेसबुकीया मां के कद्र दान इतना ही सम्मान वास्तविक जिन्दगी में भी करते हैं?अगर ऐसा है तो हर मां बाप अपनी औलाद को अपने को बर्बाद होने का कारण क्यों मानती है?! इस समाज में आज भी मैं मानता हूं की मां बाप के कद्रदान है! लेकीन प्रतिशत का सूचकांक माईनस में है?आखरी सफर के विकट रास्ते पर चलते चलते हाई प्रोफाईल सोसाइटी के लोग अनाथ आश्रम तथा बृद्धा आश्रम के मेहमान बन जाते हैं! तन्हाई से सगाई कर जग हंसाई के डर से गुमनामी में खो जाते हैं? सोसल प्लेटफार्म पर मां के प्रति समर्पण तथा जागरुकता का जो नजारा देखने को मिला उसको देखकर मन विचलित हो गया! वहीं स्वार्थ का‌ खेल देखकर‌ भ्रमित भी हो गया!खैर दिखावटी ही सही मां के ममता के मोल को स्वार्थ के तराजू में तौलकर पूरी तरह मिलावटी ही सही श्रवण कुमार के समकक्ष बनने की होड़ बेजोड़ दिखी? जरा देखिए इस मतलबी संसार के दिखावटी प्यार को! जिसने पूरी जिन्दगी बच्चो की परवरिश में गुजार दिया !जीवन सुधार दिया! उस मां के हिस्से में बच्चों के जीवन में सिर्फ एक दिन आया? गजब साहब वो भी महज दिखावटी कागजी !अगर हमारी सोच सही है तो मैं नहीं समझता की फेसबुक वाटशप पर हमदर्दी की दरिया में उफान लाने वाले असल ज़िन्दगी में कुछ ममता के मोल का निशान छोड़ दिये है?!इस मतलबी संसार में जहां चारों तरफ स्वार्थ की भयंकर वारिश हो रही है‌उस माहोल में मा‌ बाप की जिन्दगी तन्हाई में रह कर लावारिश हो रही‌ है! यह कहानी नहीं हकीकत है!हर घर में हर मां बाप को रोज मिल रही नसीहत है? मतलबी होना तो इन्सान की फितरत में है! वारिश बन्द होने पर छतरी भी बोझ लगने लगती है!वो कितने भाग्य साली है जिनके ऊपर माता पिता की छाया है?।लेकिन अब मां बाप‌ की कद्र करने वाले बिरले ही मिलते‌ है।वर्तमान‌ में संयुक्त परिवार की कल्पना करना भी अभिशाप से कम नहीं !औलाद तभी तक साथ है जब तक होता विवाह नहीं! कुछ दिन बाद ही मां बाप बोझ लगने लगते हैं। ब्यवस्था में विघटन का का बवंडर अपने ही लोगों के बीच आंधी बनकर उठने लगती है! मां बाप के जिन्दगी में ही पुरखों की धरोहर बंटने लगती है! सभी कर लेते हैं किनारा मां बाप हो जाते हैं बे सहारा! मातृ देवो भव: पितृ देवो भव: का फार्मूला तो कब का फेल हो चुका‌ है! अब यह रोग पूरे समाज में कैन्सर की तरह जड जमा दिया है।गांव से लेकर शहर तक यह जहर कहर मचा रहा है कलयुग अपनी लीला घर घर दिखा रहा है।आज कल सोसल मिडीया मे‌ श्रवण कुमारों को देखकर हैरत हो रही है?कल तक जिनको देखा मां को घर से बाहर भगाते मां को सड़क पर भूख से छटपटाते उनके लावारिश मरने के वहीं औलाद जिनकी मां विवश होकर अप यस के साथ कराहती दुनियां छोड़ दी जिनको आखरी सांस तक प्यार के दो बोल नसीब नहीं हुए? उनके फोटो के साथ सोसल मिडी या के मंच पर प्रपंच करते मातृ दिवस पर सम्वेदना ब्यक्त करते मां की आराधना करते देखकर एकबारगी दिल कराह उठा! गजब साहब गीरगिट भी स्वार्थ के पुतलों को देखकर शर्माता होगा!
किसी को बांधकर रखने की मेरी फितरत नहीं?
स्नेह का धागा हूं मजबूरी की जंजीर नहीं !

मगर समझता कौन है साहब! जिनके सर से मां का पल्लू सरक गया पिता का मजबूत हाथ हट गया उससे पूछिये न जिन्दगी के हर पल में उनकी कमी खटकती है?विकृत होती ब्यवस्था में दिखावटी आस्था का प्रति पल बढ़ता राग समाज को लगातार प्रदूषित कर रहा है।गिरावट मिलावट के इस दौर मे जब एकाकी जीवन का फार्मूला उफान पर है! संयुक्त परिवार का विघटन आपसी समरसता विवसता के आलम में निरसता भरे वातावरण के बीच दम तोड रहा है! मतलब पूरा होते ही अपना खून पराया कर घर छोड़ रहा है? फीर कौन है आखरी सफर का खैरख्वाह? जिस भी मां बाप से पूछिये सबके दिल से निकल रही है आह? उनकी किसी को नहीं है परवाह!अभी मातृ दिवस पर फेसबुकीया आधुनिक श्रवण कुमारों की आप ने होड़ देखी है! फिर पितृ दिवस पर इनका कारनामा बे जोड देखियेगा!क्या जमाना आ गया है दोस्तों हकीकत तो हर कोई जान रहा है! सच की सतह पर उतर कर किसी भी वृद्धा आश्रम में चले जाईये हकीकत छन छन कर बाहर आ जायेगी! कंसावतारिय़ो का भयानक‌ क्रूर विकृत चेहरा देखकर आप‌के होश फाख्ता हो जायेंगे? जिनके कर्मों का फल मां बाप वृद्धा आश्रम में भुगत रहे हैं।
जो वहां तक नहीं पहुंचे घरों में ही दुर्दशा झेल रहे हैं रोजाना मौत से खेल रहे हैं।कुछ तो शर्म करो बे शर्मों आज जो बो रहे हो वही तुम्हें भी काटना है?जिनके चरणों में जन्नत है जिनके आशीर्वाद से पूरी होती सारी मन्नत है! उनकी आखरी सफर की दुर्गति तेरे वजूद को मिटा देगी?,सन्तान स्वार्थी हो सकती है पर मां बाप कभी अपनी औलाद को बद्दुआ नहीं देते!भले दर दर ठोकरें खाते है।आज का बदलते परिवेश में विशेष परिवर्तन हुआ जो अपना था वहीं बे वफ़ा हुआ!आखरी सफर में दगा दिया? उन मातृ पितृ भक्तों को शत शत नमन जिनके शानिध्य मे मां बाप का कट रहा है सुखी जीवन!उन कपूतों को भी सहर्स साधुवाद!बस इन्तजार करें जो आज दे रहे हो वही तुमको भी देगी तेरी औलाद?—!!!!!
आज के दौर में उम्मीदें वफ़ा किस्से करें,??
धूप में बैठे हैं खुद पेड़ लगाने वाले??
सबका मालिक एक🕉️🙏🙏
जगदीश सिंह सम्पादक राष्ट्रीय अध्यक्ष राष्ट्रीय पत्रकार संघ भारत
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