मऊ-सन्नाटा छा गया बंटवारे के किस्से में,जब माँ ने पूछा मैं हूं किसके हिस्से में ?

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मऊ-गजब का दौर चल रहा है हर मा बाप को अपनी औलादों का ब्यवहार खल रहा है! दिल के अरमा आंसुओ में बह ग्ए हम वफ़ा करके भी तनहा रह गये का तराना आज अपनी प्रासंगिकता को हर घर में प्रदर्शित कर रहा है।क्या जमाना आ गया है दोस्तों? ज़िन्दगी की जद्दो जेहाद में सब कुछ लुटा कर आखरी सफर के पहले मन्जिल पर ही दिल कराह उठता है! वाह मालिक क्या दुनिया बनाई है! जिसे अपना समझ कर पाल पोस कर हर सुख मुहैया कराया वहीं आज बना दिया पराया! गजब मालिक तेरा खेल है!इन्सान की सोच तेरी रजा के बिना फेल है?अपनत्व का घनत्व तभी तक महत्व रख रहा है जब तक स्वामित्व का तबादला नहीं हो जाता! जिस दिन यह प्रक्रिया पुरा हुई अपने कहलाने वाले दायित्व भूल कर अपना वसूल बदल देते हैं। आधुनिकता की चासनी में डूबा प्रगतिशील समाज आज अपनी पुरातन धरोहर पुरातन संस्कृति का तिरस्कार कर जो बेदखली कि पुरुस्कार मां बाप को दे रहे हैं वह भी कुछ ही दिन बाद उसी का हकदार बन रहे है! फिर भी मुगालते में रहकर वह सब कुछ कर रहे हैं जिसकी इजाजत धर्म शास्त्र या मजहब नहीं देता है! स्वार्थ के शानिध्य में जिन्दगी के सतरंगी सपने देखने वाले अपने पालनहार के साथ जिस तरह का दुर्व्यवहार कदाचार कर समाज में प्रदुषण पैदा कर रहे हैं वह विसंगति भरे वातावरण में उदाहरण बनता जा रहा है।पितृ देवो भव: मातृदेवो भव: का आचरण स्मरण की अनुतालिका से बाहर हो गया! दुर्भाग्य के दो राहें पर खड़ी भारतीय संस्कृति भारतीय परम्परा पाश्चात्य देशों में पनाह पा रही है! वहीं जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी की अनमोल धरोहर को धारण कर जगत नियन्ता के पावन जन्म स्थलियो के सार से सारगर्भित तपोभूमि पर अवतरित होने के सुख के बाद भी अवसाद भरे आवरण में मातृसंस्था पितृ हन्ता के दोष से दोषारोपित होकर अपने को समाज में धनवान बन सम्मान जीवन जीने की पराकाष्ठा ही जीवन की दोपहरी में तबाही की धूप से मर्माहत होने को बाध्य करती है।मृगतृष्णा भरे माहौल में चन्द लम्हों का जीवन फिर भी अपनों से ही अनबन! आखिर जब कुछ साथ नहीं जायेगा फिर काहे रुदन काहे का क्रन्दन! क्यों अपनत्व का टूट जाता है बन्धन?
वास्तविकता के धरातल पर भारतीय समाज आज जिस तरह के बिखराव के दावानल में झुलस कर बर्बाद हो रहा है वह आने वाली नस्लों के लिए केवल तबाही का मंजर पैदा कर रहा है।अभी तो गनीमत का दौर है! कल मुसीबत का दौर शूरु होगा! न कोई अपना होगा न कोई सपना होगा।अगर समाज को संचालित करने वाले पुरातन सम्विधान के नजरिये से देखा जाय तो जिस तरह की गिरावट जीवन शैली में आया है वह कहीं से भी भारतीय परम्परा के हिसाब से नहीं है।धर्म -मजहब- कभी भी अपने जन्मदाता भाग्य विधाता के अनादर की इजाजत नहीं देता। संस्कार आचार विचार से परिवार का संचालन होता है।मगर अब तो मा बाप के सामने ही धन सम्पत्ति का बंटवारा कर ममता दुलार प्यार का तिरस्कार कर दरकिनार कर दिया जा रहा है।वक्त बेरहम हो चला है।सादगी का सम्वर्द्धन खत्म हो गया!अनुरागी बैरागी जीवन की जिजिप्सा धन जन की लोलिप्सा में अभिषप्त होकर रह गया।समय बदल गया परिवर्तन की पराकाष्ठा चल रही है।सब कुछ नियत है संयमित सावधान रहकर आधुनिक बफर सफर का सहकर्मी बनना मजबूरी है। तन्हा थे! तन्हा हो! तन्हा ही इस जहां से बिदा हो जाओगे! यह सन्देश सम्पूर्ण परिवेश में परिष्कृत होकर-
अग्रेषित हो रहा है। सबका मालिक एक🙏🏾🙏🏾
जगदीश सिंह सम्पादक
7860503468

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