लखनऊ-25 साल का डान श्रीप्रकाश शुक्ला

लखनऊ – 1990 के दशक में 20 से अधिक हत्या करने वाले श्री प्रकाश शुक्ला ने अपनी करतूतों से यूपी पुलिस खास तौर पर लखनऊ पुलिस की नाक में दम कर रखा था। वह वारदात करके निकल जाता और पुलिस लकीर पीटती रह जाती। इसके अलावा पुलिस का एक सिर दर्द और बढ़ गया था उसका मोबाइल फोन का इस्तेमाल। 31 मार्च 1997 को पहली बार लखनऊ में मोबाइल फोन की शुरुआत हुई थी। लखनऊ के कैसरबाग में हुए दिलीप होटल गोलीकांड में रेलवे के ठेकेदार भानु मिश्रा के कमरे में AK47 का बर्सट फायर करने के बाद श्रीप्रकाश ने गोरखपुर में उसके घर पर लैंडलाइन पर फोन भानु के बड़े भाई को बताया था कि तुम्हारे छोटे भाई का मर्डर हो गया है कफन के साथ लखनऊ पहुंचे, क्योंकि फोन वारदात के महज 2 मिनट बाद ही किया गया था लिहाजा पुलिस ने अपराधियों को पकड़ने के लिए 7 किलोमीटर के दायरे में जितने भी एसटीडी पीसीओ बूथ थे वहां पर छापेमारी की लेकिन पुलिस को कोई कामयाबी हाथ नहीं लगी। कई दिन बाद लखनऊ पुलिस को यह पता चला कि फोन मोबाइल से किया गया था ।मोबाइल का कनेक्शन गोमती नगर के एक पते पर लिया गया था। पुलिस को पता चला कि पिछले 3 दिन से मोबाइल फोन गोमती नगर के उसी टावर क्षेत्र में चल रहा था जिस पते पर खरीदा गया था।

लखनऊ पुलिस को उम्मीद थी कि हो सकता है कि चौथे दिन भी फोन करने वाला वहीं मौजूद हो तो तुरंत एक पुलिस टीम तैयार की गई और रात में उस मकान पर दबिश दी गई। जब वहां दबिश दी गई तो पुलिस को एक महिला और दो लड़कियां मिली। पुलिस ने पूरे मकान की तलाशी ली लेकिन वहां से पुलिस को कुछ खास नहीं मिला. पहली बार यह जरूर पता चला कि हत्या और वसूली की वारदात को अंजाम देने वाला ना तो अशोक सिंह है और ना ही सूरजभान बल्कि श्री प्रकाश शुक्ला है। श्री प्रकाश शुक्ला अशोक सिंह और सूरजभान सिंह के नाम से वसूली के लिए फोन किया करता था ताकि पुलिस नामों में उलझी रहे।एक तरफ तो श्री प्रकाश शुक्ला के मोबाइल फोन का इस्तेमाल पुलिस के लिए सिरदर्द बना हुआ था तो दूसरी तरफ पुलिस जिस बड़े अपराधी को पकड़ने की तमाम कोशिशें कर रही थी उसकी फोटो तक पुलिस के पास नहीं थी।

तमाम कोशिशों के बावजूद पुलिस को श्री प्रकाश शुक्ला की कोई फोटो नहीं मिल रही थी। गोरखपुर में श्री प्रकाश शुक्ला के प्रभुत्व का शिकार बने वीरेंद्र शाही और हरिशंकर तिवारी से भी संपर्क किया गया। दोनों का यह पूर्वांचल में खासा दबदबा था, उनसे भी श्री प्रकाश की फोटो उपलब्ध कराने के लिए कहा गया। दोनों ही परिवारों ने काफी कोशिश की लेकिन श्री प्रकाश शुक्ला की फोटो उन्हें भी नहीं मिली। श्री प्रकाश के दो दोस्त नीलेंद्र पांडे और किशोरी लाल से भी पुलिस ने संपर्क किया कि कहीं से श्रीप्रकाश की फोटो मिल जाए लेकिन उन्होंने भी हाथ खड़े कर दिए। पुलिस को पता चला की गोरखपुर में सैनी नाम का एक फोटोग्राफर है जो शादियों में फोटो खींचा करता था और वीडियो भी बनाया करता था। पुलिस को लगा कि इस फोटोग्राफर से श्रीप्रकाश शुक्ला की कोई फोटो मिल जाएगी लेकिन उसने भी हांथ खडा कर दिया।बाद मे श्रीप्रकाश ने सैनी को गोल मार कर मौत की नीद सुला दिया। फोटो ना मिलने की वजह से पुलिस की बहुत फजीहत हो रही थी लिहाजा पुलिस ने तय किया कि सबसे पहले श्री प्रकाश शुक्ला की फोटो ढूंढ ली जाए।

क्योंकि श्रीप्रकाश के मूवमेंट के बारे में पुलिस को खबर मिलती रहती थी और पुलिस उन जगहों पर निगरानी और छापेमारी भी करती थी लेकिन बिना फोटो के यह काम काफी मुश्किल हो रहा था। तय किया गया कि रिश्ते में श्रीप्रकाश के बहनोई लगने वाले एक शख्स के यहां रेड डाली जाए। पुलिस की एक टीम उस मकान पर पहुंची और लाटरी का व्यवसाय करने वाले उस रिश्तेदार को धर दबोचा। पहले तो उसने श्रीप्रकाश से कोई भी रिश्ता होने से मना कर दिया लेकिन जब पुलिस ने सख्ती की तो उसने बताया की श्रीप्रकाश अक्सर उसके यहां आता जाता था लेकिन पिछले कई दिनों से नहीं आ रहा है।पुलिस ने उससे श्री प्रकाश की फोटो मांगी और साथ ही उसे धमकी भी दिया कि कहीं से भी श्री प्रकाश की फोटो पुलिस को उपलब्ध कराएं नहीं तो पुलिस उसके खिलाफ ही अपराधी को शरण देने और बाकी मुकदमों में उसके खिलाफ और उसके घर की महिलाओं के खिलाफ कार्रवाई कर उनको भी जेल भेजा जाएगा। हालांकि इस धमकी का भी पति पत्नी पर कोई असर नहीं पड़ा और वो लगातार इस बात की रट लगाए रहे की शुक्ला की फोटो उपलब्ध नहीं करा सकते हैं।

इसी बीच घर की बेटी आ गई और पुलिस ने उससे अलग कमरे में ले जाकर पूछताछ करना शुरू किया। उसने बताया कि श्री प्रकाश उसका मामा लगता है। पुलिस ने अब उस लड़की को विश्वास में लेना शुरू किया और उससे पूछा गया कि उसको किस चीज का शौक है तो उसने बताया कि उसे फोटोग्राफी का शौक है।पुलिस ने पूछा फोटोग्राफी किससे करती हो ? कैमरा है तुम्हारे पास है तो वह एक छोटा सा कैमरा निकाल कर ले आई और पुलिस को अपना कैमरा दिखाया। पुलिस ने छापेमारी करने से पहले काफी होमवर्क किया था लिहाजा पुलिस को इस बात का पता था कि आखरी बार शुक्ला अपने बहनोई के यहां अपनी भांजी के जन्मदिन पर आया था। यह भी पता चला कि वह महंगा तोहफा लेकर घर पहुंचा था।लड़की ने बताया कि 6 महीने पहले उसका जन्मदिन था, पुलिस ने पूछा क्या उस दिन की तस्वीरें हैं तुम्हारे पास तो लड़की ने बताया कि हां उस वक्त की तस्वीरें उसके पास हैं। वह किताब लेकर वापस आई और उसी किताब के पन्नों के बीच उसने 4-5 फोटोग्राफ निकाल कर पुलिस को थमा दी। तस्वीरों में उसके मां-बाप व उसके कुछ दोस्त भी दिख रहे थे साथ ही फोटो में एक खूबसूरत नौजवान भी दिखाई दे रहा था। पुलिस ने लड़की से पूछा कि यह कौन है तो उसने बताया यही श्रीप्रकाश मामा है। फोटो मिलने की खबर पास के कमरे में बैठे लड़की के मां-बाप को लग गई । दोनों भाग के अब उस कमरे में आ गए जहां पर पुलिस लड़की से पूछताछ कर रही थी। आते ही दोनों ने पुलिस वालों के पांव पकड़ लिए।उनका कहना था कि यह फोटो बाहर किसी ने देखी या कहीं भी छपी तो श्री प्रकाश को पता लग जाएगा यह फोटो इसी घर में खींची है और वह किसी भी हालत में पूरे परिवार का कत्ल कर देगा भले ही वो उसके रिश्ते में बहन बहनोई लगते हो। पुलिस ने परिवार को दिलासा दिलाया कि अगर शुक्ला फोटो देख भी ली तब भी उसे पता नहीं चलेगा।

इसके बाद पुलिस की टीम वहां से निकल गई।टीम को फोटो के साथ एसएसपी दफ्तर आने को कहा गया क्योंकि तत्कालीन एसएसपी श्री प्रकाश की फोटो प्रेस कान्फ्रेंस में जारी करना चाहते थे। हालांकि पति पत्नी की बात अब भी पुलिस के दिमाग में घूम रही थी क्योंकि उन्हें लग रहा था की फोटो सार्वजनिक होते ही इस परिवार का बचना मुश्किल है। अगर परिवार को कुछ होता है तो फिर से पुलिस की फजीहत होगी, क्योंकि शुक्ला के रिश्ते का बहनोई लाटरी का एक बड़ा कारोबारी था। उसका समाज में ठीक-ठाक रसूख था। पुलिस की टीम बस इस उधेड़बुन में लगी थी कि कैसे कुछ ऐसा किया जाए कि काम भी हो जाए और प्रकाश को पता भी ना लगे की पुलिस को यह फोटो कहां से मिली है।

तब पुलिस टीम के एक सदस्य ने सुझाव दिया कि इस फोटो का नक्शा चेंज कर दिया जाए यानी कुछ ऐसा किया जाए कि मालूम ही ना चले यह फोटो कब और कहां ली गई थी। पुलिस के एक अधिकारी उस फोटोग्राफ को लेकर हजरतगंज बाजार गए और वहां उन्होंने पटरी पर हीरो की इमेज वाले कई पोस्टकार्ड बिकते दिखे तब उनके दिमाग में आइडिया आया। उन्होंने एक पोस्टकार्ड लिया जिस पर सुनील शेट्टी की तस्वीर थी जिसमें उसने डेनिम शर्ट पहन रखी थी। इसके बाद वह उस पोस्ट कार्ड को लेकर एक रंगीन फोटोस्टेट की दुकान पर पहुंचे। श्री प्रकाश शुक्ला की फोटोग्राफ देखकर दुकानदार भी घबरा गया लेकिन जब पुलिस ने उसे विश्वास में लिया तो वह तैयार हो गया और बड़ी बारीकी से सुनील शेट्ठी के फोटोग्राफ में शेट्टी के गर्दन का हिस्सा काटा गया और उस हिस्से पर श्री प्रकाश शुक्ला के गरदन का हिस्सा स्थापित कर दिया गया। खुशकिस्मती से श्रीप्रकाश के चेहरे वाला फोटो पोस्टकार्ड वाले सुनील शेट्टी के चेहरे पर पूरी तरह से फीट हो गया।फोटो देखकर अंतर बताना मुश्किल था इस फोटो में चेहरा और घर अलग-अलग है।इसके बाद ग्लासी सीट पर उस फोटोग्राफ की करीब 200 कापियां निकाली गई और इन सभी फोटो कॉपियों को लेकर अधिकारी एसएसपी दफ्तर रवाना हो गए।

कुछ दिन बाद पुलिस ने एक फोन टेप किया जिसमें श्री प्रकाश का एक गुर्गा उसे बताता है कि उसकी फोटो सारे अखबारों में छपी है। इस पर श्री प्रकाश ने पूछा कि उसने क्या पहन रखी है ? इस पर उसने श्रीप्रकाश को जवाब दिया कि डेनिम की शर्ट है।इस पर शुक्ला ने कहा कि इस वजह से वह डेनिम की शर्ट नहीं पहनता क्योंकि डेनिम की शर्ट दिल्ली मुंबई जैसे बड़े शहरों में पहनी जाती है और छोटे शहरों में इस तरह की शर्ट पहनने वाले लोगों को आसानी से पहचाना जा सकता है। पुलिस ने जब फोन ट्रेस किया तो पता चला श्री प्रकाश उस वक्त नेपाल में मौजूद था हालांकि अपनी फोटो मिलने से वह बेहद परेशान हो गया था। बस यही से श्री प्रकाश की आखिरी गिनती भी शुरू हो गई, हालांकि इसके बाद भी श्रीप्रकाश ने कई वारदात को अंजाम दिया लेकिन आखिरकार वो केवल और केवल उसी फोटो की वजह से मारा गया।

21 सितंबर 1998 को एसटीएफ को मुखबिर ने बताया की अगली सुबह 5.45 बजे शुक्ला रांची से दिल्ली के लिए रवाना होगा।5.45 बजे सारी रात एयरपोर्ट पर घात लगाए बैठे एसटीएफ के अधिकारी कल की 3:00 बजे भोर तक इंतजार करते रहे पर वह नहीं आया। लेकिन 22 को पुलिस को पता चला कि शुक्ला अपना मोबाइल फोन इस्तेमाल कर रहा है। पुलिस को सर्विलांस से पता चला कि वह दिल्ली के वसंत कुंज के अपने ठिकाने पर आएगा। दोपहर 1:50 बजे उसकी नीली सिएलो कार मोहन नगर फ्लाईओवर के पास दिखी।वहां पहले से ही पुलिस की 5 गाड़ियां तैनात थी। गाड़ी शुक्ला चला रहा था और अनुज प्रताप सिंह उसके साथ आगे और सुधीर त्रिपाठी पीछे बैठा था। उसे खतरा महसूस हुआ तो उसने स्पीड बढ़ाया और पुलिस की पहली और दूसरी गाड़ी को चकमा दे दिया तभी इस्पेक्टर वीपीएस चौहान ने अपनी जिप्सी उसकी कार के आगे अडा दिया।खतरे को सामने देख शुक्ला घूमकर तेजी से यूपी आवास विकास कॉलोनी की तरफ भगाया। पुलिस ने पीछा किया स्टेट हाईवे पर उसे घेर लिया गया उसने भी रिवाल्वर निकाल ली उसने 14 गोलियां दागी। पुलिस वालों ने 45 मिनट में उसका तथा उसके साथियों का काम 22 सितंबर 1998 को दिन मे 2 बजे काम तमाम कर दिया।

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