गाजीपुर-कामरेडों को मूर्ति पूजा नहीं आती-कवि माधव कृष्ण(समीक्षा)

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गाजीपुर-माधव कृष्ण की कविताओं में मिट्टी की गंध है, रिश्तों और प्रेम की गरमाहट-सुगबुगाहट है, समाज की सड़ी व्यवस्थाओं के प्रति आक्रोश है और आमजन के प्रति बेहद आत्मीयता है। चाहे वो रिक्शेवाला हो या भेड़ चराने वाली रधवा हो। कवि कॉरपोरेट वर्ल्ड में रहा है इसलिए ‘कॉरपोरेट कल्चर’ पर जहां-तहां व्यंग्य है, कवि शिक्षा से जुड़ा है इसलिए शिक्षा-व्यवस्था की कमियां और उन्हें दूर करने के उपाय सुझाता है, कवि आमजन से जुड़ा है अतः उनकी दर्द पीड़ा सहज भाव से संप्रेषित करता है। साहित्य राजनीति और धर्म पर पैना व्यंग्य इस काव्य-संग्रह की विशेषता है। कवि शास्त्रों के तत्व को जानने वाला है और उसके प्रति कृतज्ञता भाव रखता है अतः शास्त्रों की गूढ़ बातें सहज होकर कविता में आ गई हैं। एक तरह से ज्ञान की छौंक। कवि भक्त हृदय है और योगेश्वर कृष्ण का अनन्य भक्त होने के कारण कई कविताएं कृष्ण के आसपास घूमती हैं।

‘कामरेडों को मूर्तिपूजा नहीं आती’ कविता भी है और करारा व्यंग्य भी उन पर जो केवल बकवास करते रहते हैं काम कुछ भी नहीं करते। जाती व्यवस्था के दंश से आक्रोशित कवि, रिश्वतखोरी, भाई- भतीजावाद और हिंसा से परेशान होकर एक ऐसे जगत की तलाश करता है जो पूर्ण हो, जहां कुछ भी अपूर्ण न हो, किंतु क्या आसान है? परंतु कवि आशावादी है, वह टूटना नहीं जानता और पाक मोहब्बत पर यकीन करता हुआ भारत की पुरानी गंगा जमुनी तहजीब को फिर से विकसित करना चाहता है।

डॉ शिखा तिवारी
एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, डी सी एस के पी जी कॉलेज, मऊ

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