गाजीपुर-डा०मुख्तार अहमद अंसारी, जिले का कोहिनूर

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अज़ीज़ों,
आइये महान स्वतंत्रता सेनानी और कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष डॉक्टर मुख़्तार अहमद अंसारी साहेब का जन्म 25 दिसंबर 1880 मे गाजीपुर जनपद के मुहम्मदाबाद कस्बे मे हुआ था और मृत्यु 10 मई 1936 को हुई।आज उनके बरसी के मौके पे खिराजे अक़ीदत पेश करें !!

डॉ मुख़्तार अहमद अंसारी आज़ादी के मशहूर आन्दोलन का एक गुम हो चुका नाम हैं, एक ऐसा नाम जिन्हें ढूँढने की भी कोशिश नहीं की जा रही. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष रहे अंसारी ने आज़ादी के आन्दोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी के “फौन्डिंग मेम्बर” रहे और डॉ हकीम अजमल ख़ान के इन्तेक़ाल के बाद चांसलर के बतौर भी यूनिवर्सिटी के मक़सद को आगे ले गए.वे आजीवन उसके संरक्षक थे,

अपने पूरे जीवन पर वह कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य रहे। 1920, 1922, 1926, 1929, 1931 तथा 1932 में वह इसके महासचिव थे तथा सन् 1927 ई. में 42वें कांग्रेस अधिवेशन के सभापति हुए जिसकी बैठक मद्रास में हुई थी। इस अधिवेशन के अवसर पर अध्यक्ष पद से बोलते हुए इन्होंने हिंदू-मुस्लिम-एकता पर विशेष बल दिया था। उनके भाषण से प्रेरित होकर पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पारित हुआ. उनके ही प्रयास से कुछ साल बाद स्वराज पार्टी को फिर से जिंदा किया गया

1928 ई. में लखनऊ में होने वाले सर्वदलीय सम्मेलन का इन्होंने सभापतित्व किया था और नेहरू report का समर्थन किया। डॉ॰ अंसारी भारतीय मुस्लिम राष्ट्रवादियों की एक नयी पीढ़ी में से एक थे जिसमें मौलाना आजाद, मुहम्मद अली जिन्ना जैसे लोग शामिल थे। वे आम भारतीय मुसलमानों के मुद्दों के बारे में बहुत भावुक थे लेकिन जिन्ना के विपरीत, अलग मतदाताओं के सख्ती से खिलाफ थे और उन्होंने जिन्ना के इस दृष्टिकोण का विरोध किया था कि केवल मुस्लिम लीग ही भारत के मुस्लिम समुदायों की प्रतिनिधि हो सकती है। डॉक्टर अंसारी के प्रयास से ही 1934 में डॉ राजेंद्र प्रसाद और जिन्ना में बातचीत हुई. लेकिन, वह प्रयास विफल रहा. इससे डॉक्टर अंसारी को धक्का लगा. उनकी सेहत गिर रही थी. इस कारण भी उन्होंने कांग्रेस के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया.

उन्हें फुरसत के कुछ पल मिले. एक किताब लिखी. दूसरी तरफ जामिया मिलिया पर वे ध्यान देने लगे. उन्हीं का फैसला था कि ओखला में जामिया को बसाया जाये, उन्होंने वर्तमान जामिआ की परिकल्पना की। भविष्य का नक्शा बनाया। ज़मीनें ख़रीदीं। जामिआ चलाने में साठ हज़ार का कर्ज़ हो गया। उस ज़माने के हिसाब से यह राशि बहुत बड़ी थी। अब्दुल मजीद ख्वाजा और डॉ0 अंसारी ने पुरे भारत का दौरा कर चंदा इकठ्ठा किया और आखिर 1 मार्च 1935 को ओखला में जामिया की बुनियाद रखी गई।

मालूम है बुनियाद का पत्थर किसने रखा ? बुनियाद का पत्थर सबसे कम उम्र के विद्यार्थी अब्दुल अज़ीज़ ने रखा था। डॉ मुख़्तार अहमद अंसारी जामिया मिलिया इस्लामिया के अमीर-ए-जामिया (कुलाधिपति) रहे और डॉक्टर जाकिर हुसैन को कुलपति बनाया.

रामपुर के नवाब के निमंत्रण पर मसूरी गये. लौटते समय ट्रेन में 10 मई, 1936 की रात को डॉ. अंसारी को दिल का दौरा पड़ा और उनका दिल रेल के डिब्बे में आखिरी बार धड़का। उनके शरीर को उनके प्रिय जामिया मिलिया इस्लामिया की गोद में अन्ततः लेटा दिया गया, उनकी क़ब्र जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी में है।

उनके निधन पर महात्मा गांधी ने कहा- ‘ शायद ही किसी मृत्यु ने इतना विचलित और उदास किया हो जितना इसने’|

भारत के दौरे पर आये तुर्की के सदर रजब तय्यिब एरदोगान ने जामिया मीलिया इस्लामीया के द्वारा मिल़े डॉक्टरेट की उपाधि पर शुक्रीया अदा करते हुए डॉ मुख़्तार अहमद अंसारी के कारनामो को याद किया था. (इरफान अब्दुल खान की फेसबुक वाल से)

मोहम्मद उमर अशरफ

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