भारत के इतिहास का वह काला समय जब 83 लाख लोगो की नसबंदी हुई

गाजीपुर- 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्चन्यायालय ने भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व० इन्दिरा गान्धी के लोकसभा चुनाव को अबैध घोषित कर दिया। इलहाबाद उच्च न्यायालय ने इन्दिरा गान्धी के खिलाफ यह फैसला उनके प्रतिद्वंद्वी राजनरायन के याचिका पर दिया था। इन्दिरा गांधी ने सुप्रीम कोर्ट मे अपील की बात कर लोकसभा और प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र देने से इनकार कर दिया। बिपक्षी दलो ने इन्दिरा गांधी के खिलाफ जयप्रकाश नारायण के अगुआई से पुरे देश मे आन्दोलन छेड दिया। बिपक्षी आन्दोलन से घबराई इन्दिरा गान्धी ने 25 जून 1975 की मध्य रात्रि से पुरे देश मे आपातकाल /इमरजेंसी लगा दिया। इसके बाद इन्दिरा गांधी के बेटे संजय गांधी और उनके मित्रों बंशीलाल, विद्याचरण शुक्ल, ओम मेहता भारत के सत्ता पर अप्रत्यक्ष रूप से काबिज हो गये। संजय गांधी की पांच सूत्रीय योजना 1- परिवार नियोजन 2- दहेज प्रथा का खात्मा 3-वयस्क शिक्षा 4 – जाति प्रथा का खात्मा 5 – पेंड लगान पुरे देश मे कडाई से लागू किया जाने लगा। राजनैतिक दलों के सभी छोटे बडे नेता पकड़ कर जेल मे डाले जाने लगे। संजय गान्धी के ड्रीम प्रोजेक्ट परिवार नियोजन के लक्ष्य को पुर्ण करने के लिए जीन अधिकारियों, कर्मचारियों के दो या उससे अधिक बच्चे थे उनके बेतन रो कर जबरी नसबंदी कराई जाती थी। बीना टिकट रेल यात्रा करने पर , पकडे जाने पर जवान हो या किशोर उसकी नसबंदी कर दिया जाता था। गांव के भोले भाले लोगों को ट्रकों मे भरकर लाया जाता था और जबरन नसबंदी कर दिया जाता था। आपतकाल लागू होने के कारण पुलिस के डंडे मे सारी ताकत निहित थी। थानों मे गुंडा एक्ट मे दर्ज गुंडों को 10 से लेकर 20 नसबंदी का केस देने पर , गुंडा एक्ट से नाम काटने का आफर दिया जाता था और ये गुंडे गांव के गरीब व कमजोर लोगों को डारा धमका कर जबरन नसबंदी करा देते थे। 26 जून 1975 से 21 मार्च 1977 के मध्य कुल 83 लाख जबरन नसबंदी कराई गयी।

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