हे महाबीर गोरक्षकों कहाँ हो ?  आओं हमारे फसलों को इन से बचाओ

गाजीपुर , समय बदला और आदमी की सोच बदली , एक समय था ग्रामिण क्षेत्रो मे मे गाय,भैंस,बकरी आदि पालते थे। वर्ष 1990 से पुर्व सभी के दरवाजे पर देशी गाय हुआ करती थी , देशी गाय की बाछी और बछडा दोनो का ग्रामिण उपयोग करते थे। देशी गाय के बछडे युवा/जवान हो कर बैल बन कर हमरे खेत की जूताई करते थे और किसान के परिवार के एक महत्व पुर्ण सदस्य हुआ करते थे। उसी समय के लगभग खेतो की जूताई मे ट्रैक्टर का प्रचलन शुरू हुआ और कृषको को बैलो की उपयोगिता के खत्म होने का अहसास हुआ। कृषको के लिये देशी गाय का महत्व भी धीरे-धीरे खत्म होने लगा। कृषकों ने अब देशी गाय के जगह अधिक दुध देने वाली जर्सी गाय को पालना शुरु किया। जर्सी गाय दुध तो अधिक देती थी लेकिन उसके बछडे की कोई उपयोगिता नही थी। अब मै आप को उस कटु सच्चाई से अवगत करने जा रहा हुँ जिसे हर जर्सी गाय पालने वाले ने किया है और वह है  हर जर्सी गाय पालने वाले ने जर्सी गाय के बछडे को आज से 5 माह पहले कसाई /नट को हजार, पन्द्ह सौ या दो हजार मे बेचा है। कसाई/नट ने उस बछडे को बुचड खाने मे बेचा और वहाँ वह मांस के लिये काट कर बिदेशो मे भेजा गया। हालात तब बदले जब देश मे मोदी जी प्रधान मंत्री बने और गोरक्षा के नाम पर गोरक्षको ने बुचड खानों के एजेन्ट के रूप मे काम करने बाले कसाईयों/नटो को पीट-पीट कर मार डालना शुरू किया। कुछ सामान्य मुस्लमान भी प्रभावित हुआ। इस के बाद बुचड खानों के एजेन्टो ने अनउपयोगी गाय एवं जर्सी के बछडो को मौत के भय से खरीदना ही बन्द कर दिया। अब लगभग हर गाँव मे जर्सी गाय के बछडो की संख्या कम से कम 8 और अधिक की कोई संख्या निर्धारित नही है। इन जर्सी गाय के बछडों का झूंड अब किसानो के लिये अच्छा खासा सरदर्द बन गये है। किसान समझ नही पा रहा है कि करे क्या ? 

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