मोहम्मद अली जौहर:कलम,खादी और खिलाफत के योद्धा: पत्रकारिता, आजादी और मुस्लिम अस्मिता के प्रतीक

गाजीपुर: वर्तमान समय में रामपुर में सपा नेता आज़म ख़ान द्वारा स्थापित “मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय” काफी चर्चा में है। कारण वहां के जिलाधिकारी ने विश्वविद्यालय को ध्वस्त करने का आदेश पारित किया है। इस आदेश को लेकर हिन्दू व मुसलमान सभी की प्रतिक्रिया एक है। लोगों का कहना है कि जहां तक नक्शा पास न होने के आधार पर विश्वविद्यालय को ध्वस्त करना ग़लत है। सरकार चाहे तो इस विश्वविद्यालय को अपने अधिकार में ले ले लेकिन ध्वस्त न करे। इन्हीं चर्चाओं मध्य लेखक के मन में यह विचार आया कि मोहम्मद अली जौहर कौन थे जिनके नाम पर आज़म खान ने विश्वविद्यालय की स्थापना किया। आईये आप भी उनके बारे में जानें:मौलाना मोहम्मद अली जौहर 20वीं सदी के भारत के उन गिने-चुने नेताओं में थे जिन्होंने कलम से अंग्रेजों की नींद उड़ाई और भाषण से करोड़ों लोगों को आजादी की लड़ाई से जोड़ा। वे सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि पत्रकार, शिक्षाविद, इस्लामी विद्वान और गांधी जी के सबसे करीबी साथियों में से एक थे।जीवन परिचय:जन्म: 10 दिसंबर 1878 को रामपुर रियासत, उत्तर प्रदेश में एक प्रतिष्ठित मुस्लिम परिवार में हुआ। पिता: अब्दुल अली खान रामपुर स्टेट में पुलिस अफसर थे।शिक्षा:प्रारंभिक शिक्षा रामपुर में हुई। इसके बाद अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और फिर ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, इंग्लैंड से उच्च शिक्षा प्राप्त की। ऑक्सफोर्ड में वे पहले भारतीय थे जिन्हें “Man of the Year” का सम्मान मिला। भाई:छोटे भाई शौकत अली भी खिलाफत आंदोलन के प्रमुख नेता थे। दोनों को “अली बंधु” के नाम से जाना जाता था।निधन:निधन: 4 जनवरी 1931 को लंदन में निधन हुआ। इच्छा अनुसार उन्हें यरूशलम के अल-अक्सा मस्जिद परिसर में दफनाया गया। संघर्ष और योगदान: पत्रकारिता से बगावत – “कॉमरेड” और “हमदर्द”। प्रतिष्ठित ICS की नौकरी छोड़ा:1903 में ICS की नौकरी छोड़कर उन्होंने पत्रकारिता को चुना। 1911 में कलकत्ता से अंग्रेजी साप्ताहिक “Comrade” और 1913 में उर्दू दैनिक “Hamdard” शुरू किया।इन अखबारों के जरिए उन्होंने अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों, रॉलेट एक्ट और जलियांवाला कांड की खुलकर आलोचना की। नतीजा: कई बार जेल गए और अखबार जब्त हुए। उनकी लेखनी की ताकत से अंग्रेज थर-थर काँपते थे। ख़िलाफत आंदोलन के नेता:प्रथम विश्व युद्ध के बाद तुर्की के खलीफा के पद को बचाने के लिए उन्होंने खिलाफत आंदोलन का नेतृत्व किया।1920 में गांधी जी के साथ मिलकर उन्होंने खिलाफत को कांग्रेस के असहयोग आंदोलन से जोड़ दिया। उनका नारा था – “हिंदू-मुस्लिम एकता”। उन्होंने कहा “मेरी मस्जिद और आपका मंदिर खतरे में है, इसलिए हमें साथ लड़ना है”। असहयोग आंदोलन और जेल यात्रा:गांधी जी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर उन्होंने 1920 का असहयोग आंदोलन चलाया। अंग्रेजों द्वारा दी गई “सर” की उपाधि वापस कर दी। 1921 में उन्हें 2 साल की सजा हुई। जेल से छूटने के बाद भी वे लगातार दौरों पर रहे। गोलमेज सम्मेलन:1930-31 में लंदन में हुए दूसरे गोलमेज सम्मेलन में वे कांग्रेस के प्रतिनिधि थे। वहीं बीमारी के कारण उनका निधन हो गया। विचार और व्यक्तित्व:मोहम्मद अली जौहर तीखे वक्ता, बेबाक लेखक और हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रबल समर्थक थे। वे चाहते थे कि भारत का मुसलमान आधुनिक शिक्षा ले और साथ ही अपनी पहचान भी बचाए। वे अलीगढ़ आंदोलन के आलोचक थे और मानते थे कि शिक्षा के साथ-साथ राजनीतिक संघर्ष भी जरूरी है। क्या रामपुर में इन्हीं के नाम पर यूनिवर्सिटी है ? जी हां ।
समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और रामपुर के पूर्व विधायक आजम खान ने मोहम्मद अली जौहर की स्मृति में रामपुर में एक विश्वविद्यालय की स्थापना की।नाम: मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय, रामपुर, स्थापना: 2006 में आजम खान ने इसकी नींव रखी और 2014 में इसे पूर्ण विश्वविद्यालय का दर्जा मिला। उद्देश्य:: इस यूनिवर्सिटी को बनाने का मकसद रामपुर और आसपास के क्षेत्र के छात्रों, खासकर अल्पसंख्यक छात्रों को उच्च शिक्षा, तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा देना था। कैंपस:करीब 400 एकड़ में फैला यह कैंपस आधुनिक सुविधाओं से लैस है। इसमें मेडिकल कॉलेज, इंजीनियरिंग, लॉ और अन्य कोर्स चलाए जाते हैं।आजम खान का कहना था कि मोहम्मद अली जौहर रामपुर की धरती के सपूत थे और उनके नाम पर विश्वविद्यालय बनाकर वे उनकी विरासत को जिंदा रखना चाहते हैं। निष्कर्ष:मोहम्मद अली जौहर का जीवन इस बात का उदाहरण है कि कैसे एक कलम और एक आवाज पूरे देश की दिशा बदल सकती है। वे आज भी उन लोगों के लिए प्रेरणा हैं जो अन्याय के खिलाफ बोलना चाहते हैं और देश की एकता को मजबूत करना चाहते हैं।रामपुर में उनके नाम पर बना विश्वविद्यालय इसी विरासत को आगे बढ़ाने की कोशिश है।








