जौहर विश्वविद्यालय को ध्वस्त करने के आदेश पर उठ रहे सवाल

रमपुर। रामपुर स्थित जौहर विश्वविद्यालय को ध्वस्त करने के आदेश को लेकर शिक्षा जगत और आमजन में गहरी चिंता देखी जा रही है। एक विश्वविद्यालय किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि शिक्षा का मंदिर होता है जहाँ से देश के भविष्य का निर्माण होता है। विधिक विकल्पों पर क्यों नहीं विचार ?विशेषज्ञों और शिक्षाविदों का कहना है कि यदि किसी प्रकार की अनियमितता हुई है तो कानून के दायरे में दंड, जुर्माना, नियमितीकरण अथवा अन्य वैधानिक उपाय उपलब्ध हैं। लेकिन किसी शैक्षणिक संस्थान को ही समाप्त कर देना हजारों विद्यार्थियों, शिक्षकों और कर्मचारियों के भविष्य को अनिश्चितता में धकेल देता है। इस संदर्भ में कई अहम सवाल उठ रहे हैं: क्या प्रशासन ने बताया है कि यदि विश्वविद्यालय बंद हो गया तो हजारों छात्रों की पढ़ाई कहाँ होगी? उनका शैक्षणिक वर्ष कैसे बचेगा और उन्हें किस संस्थान में समायोजित किया जाएगा? अभिभावकों द्वारा फीस के रूप में किया गया निवेश कौन सुरक्षित करेगा? क्या रामपुर में शिक्षा के सभी संसाधन पर्याप्त है ? सवाल यह भी है कि क्या रामपुर में शिक्षा का स्तर, उच्च शिक्षण संस्थानों की उपलब्धता, छात्र-शिक्षक अनुपात और सीटों की संख्या इतनी आदर्श हो चुकी हैं कि एक स्थापित विश्वविद्यालय को ध्वस्त करना प्रशासन की प्राथमिकता बन गया है? जब देश अभी भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और उच्च शिक्षा तक पहुंच बढ़ाने की चुनौती से जूझ रहा है, तब एक विश्वविद्यालय को समाप्त करना किस जनहित की पूर्ति करेगा? संरचनात्मक सुरक्षा और वैकल्पिक उपाय:यह भी पूछा जा रहा है कि क्या प्रशासन ने इस परिसर के भवनों का स्वतंत्र Structural Stability Test कराया है? यदि भवन संरचनात्मक रूप से सुरक्षित पाए जाते हैं और प्रमाणित इंजीनियरों द्वारा स्थिरता प्रमाणपत्र दिया जा सकता है, तो भारी आर्थिक दंड लगाकर, आवश्यक शर्तों के साथ मानचित्र/स्वीकृति को नियमित करने जैसे वैधानिक विकल्पों पर विचार क्यों नहीं किया गया? यदि ऐसे विकल्प उपलब्ध हैं, तो फिर ध्वस्तीकरण पर इतनी ज़िद क्यों? कानूनविदों का मानना है कि यदि कहीं नियमों का उल्लंघन हुआ है तो कानून के अनुसार कार्रवाई अवश्य होनी चाहिए, लेकिन निर्दोष विद्यार्थियों के भविष्य की कीमत पर नहीं। सर्वोच्च न्यायालय ने भी विधिसम्मत प्रक्रिया और मनमानी कार्रवाई से बचने की आवश्यकता पर बल दिया है। प्रशासनिक कार्रवाई न्यायसंगत, संतुलित और अनुपातिक होनी चाहिए। राजनैतिक प्रतिशोध की आशंका:दुर्भाग्य से यह पूरा घटनाक्रम राजनीतिक प्रतिशोध (Vendetta Politics) की आशंका को जन्म देता है। लोकतंत्र में सरकारें और प्रशासन प्रतिशोध के लिए नहीं, बल्कि न्याय, शिक्षा और जनहित की रक्षा के लिए होते हैं। शिक्षण संस्थानों को राजनीतिक लड़ाइयों का मैदान बनाना राष्ट्रहित में नहीं हो सकता। संवैधानिक संस्थाओं से अपेक्षा:देश की संवैधानिक संस्थाओं — माननीय राष्ट्रपति जी, माननीय राज्यपाल जी एवं संबंधित संवैधानिक प्राधिकारियों से अपेक्षा है कि वे यह सुनिश्चित करें कि संविधान की भावना, विधि का शासन और विद्यार्थियों का भविष्य सर्वोपरि रहे।विश्वविद्यालयों को बुलडोज़र से नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण प्रक्रिया, शिक्षा और सुधार की भावना से संचालित किया जाना चाहिए।








