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यह है या था कांग्रेस और भाजपा सरकार में अन्तर

नई दिल्ली – यूपीए-वन का दौर था। नटवर सिंह विदेश मंत्री थे। उनके बेटे जगत सिंह पर इराक में चल रहे ‘फूड फॉर ऑयल’ प्रोग्राम में भ्रष्टाचार के आरोप लगे। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उन्हें निकाल कर मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया। इसके बाद नटवर सिंह का पॉलिटिकल करियर खत्म हो गया।पवन बंसल रेल मंत्री थे। उनके भतीजे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। कांग्रेस लीडरशिप ने इस्तीफा लेने में देर नहीं की। पवन बंसल भी इसके बाद हाशिये पर चले गए।कोयला घोटाले का मुद्दा गरम था। अश्विनी कुमार कानून मंत्री थे। उन पर सीबीआई की जांच को प्रभावित करने का आरोप लगा। कांग्रेस सत्ता में थी, लेकिन कोई रियायत नहीं दी गई। अश्वनी कुमार को इस्तीफा देना पड़ा।कारगिल युद्ध में शहीद हुए सैनिकों और उनके परिवारों के लिए मुंबई में आदर्श सोसाइटी बनाई गई। अशोक चव्हाण महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे। आरोप लगे कि फ्लैट आवंटन में घोटाला हुआ। कांग्रेस ने सिर्फ चव्हाण का इस्तीफा नहीं लिया बल्कि उनके खिलाफ सीबीआई जांच भी करवाई।अशोक चव्हाण कोई छोटे मोटे नेता नहीं थे। महाराष्ट्र जैसे बड़े और अहम राज्य के मुख्यमंत्री थे। अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्री के खिलाफ सीबीआई जांच कराने का दुस्साहस मनमोहन सिंह जैसा प्रधानमंत्री और कांग्रेस जैसा राजनीतिक दल ही कर सकता है।यहां उन मंत्रियों के नाम नहीं लिखे जा रहे जिनको यूपीए के दौर में किसी घोटाले में नाम आने की वजह से इस्तीफा देना पड़ा था। सिर्फ उनका जिक्र है जिनको ‘कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ की वजह से मंत्री पद गंवाना पड़ा। इसके बाद इन सबका पॉलिटिकल करियर लगभग खत्म हो गया।इसके उलट मौजूदा दौर में मोदी कैबिनेट के लगभग हर मंत्री पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं। बड़े मंत्री तो ‘कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ के मामलों में भी घिरे हैं। लेकिन प्रधानमंत्री के अंदर इतनी नैतिक शक्ति नहीं दिखती कि अपने मंत्रियों का इस्तीफा ले लें। भारतीय जनता पार्टी के माथे पर भी शिकन तक नहीं आती।