अरे ! प्रधानों की गयी भैंस पानी में

लखनऊ – एक तरफ उप्र भाजपा सरकार झूठी तारीफ के प्रायोजित कार्यक्रम लगातार करवा रही है, वहीं दूसरी तरफ माननीय इलाहाबाद हाईकोर्ट की फटकार ने सरकार के रंग में भंग डाल दिया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि ‘कार्यकाल खत्म होने के बावजूद ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने का यूपी सरकार का फैसला असंवैधानिक है’। कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद अब जनता पूछ रही है कि ‘असंवैधानिक काम करने की सजा क्या होती है?’सरकार के आदेश के बाद ग्राम प्रधानों को उम्मीद थी कि प्रशासक बनकर वे गांव में कुछ नए काम कराएंगे। कई प्रधानों ने जनता से वादे भी कर दिए थे। अब हाईकोर्ट के फैसले के बाद तकनीकी पेंच में प्रधान फंस गए हैं। जनता तकनीकी बातें नहीं समझती। गांव वाले यही मानेंगे कि प्रधान जी ने वादा पूरा नहीं किया और सारा फंड-बजट-पैसा डबल इंजन के साथ मिल-बांटकर खा गए।प्रधानों में इस बात का भी डर बैठ गया है कि कहीं ‘इन बीच के दिनों’ में किए गए खर्चे का खामियाजा उन्हें अपनी जेब से न भरना पड़े। चर्चा यह भी है कि कल को ‘पैसा वापसी’ का आदेश भी आ सकता है। जब कार्यकाल ही गलत साबित हो गया है, तो उस दौरान खर्च हुआ पैसा भी कानूनी रूप से गलत माना जाएगा। भाजपा ने प्रधानों को बहुत बुरा फंसा दिया है।जिन प्रधानों ने ठेकेदारों को काम दिया था, अब वे ठेकेदार भी ‘इन बीच के दिनों’ के बिलों का भुगतान करवाने के लिए प्रधानों का दरवाजा खटखटाएंगे। भुगतान न होने पर विवाद बढ़ेगा। इसी डर से प्रधान अब भाजपाइयों और उनके संगी-साथियों की गांव-गांव में नाकाबंदी करने की तैयारी में हैं। प्रधानों का कहना है कि सरकार के फैसले ने उन्हें जनता के सामने झूठा साबित कर दिया।इस पूरे मामले ने भाजपा को बैकफुट पर ला दिया है। विपक्ष हमलावर है। गांवों में प्रधानों की नाराजगी खुलकर सामने आ रही है। हालात ये हैं कि पंचायती राज मंत्री तो घर से ही नहीं निकल पाएंगे, गांव पहुंचना तो दूर की बात है।(अखिलेश यादव के फेसबुक वॉल से)








